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उत्तराखंड के नीचे फंस गई है 115 km लंबी टेक्टोनिक प्लेट, 8.1 तीव्रता के महाभूकंप का खतरा – myuttarakhandnews.com

नई दिल्ली; हिमालय ऊपर से शांत दिखता है. पहाड़ हरे-भरे हैं. नदियां बह रही हैं. पर्यटक घूम रहे हैं. लेकिन इन पहाड़ों के बहुत गहरे नीचे कुछ बहुत बड़ा हो रहा है. भारतीय प्लेट और तिब्बती प्लेट टकरा रही हैं. यह टक्कर रोजाना चल रही है, लेकिन दोनों प्लेट्स कहीं-कहीं फंस गई हैं. ऊर्जा कहीं जा नहीं रही. वह जमीन के नीचे जमा होती जा रही है. एक नई स्टडी ने साफ चेतावनी दी है कि उत्तराखंड के नीचे यह ऊर्जा अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि एक बहुत बड़े भूकंप के लिए काफी है.
यह स्टडी आईआईटी बॉम्बे और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के शोधकर्ताओं ने मिलकर की है. इसमें सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तमिलनाडु के वैज्ञानिक भी शामिल हैं. उन्होंने ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम यानी GNSS और जापान के ALOS-2 रडार सैटेलाइट के आंकड़ों का इस्तेमाल किया.
इन आंकड़ों से पता चला कि मेन हिमालयन थ्रस्ट नाम का विशाल फॉल्ट, जो उत्तराखंड के नीचे है, लगभग 115 किलोमीटर की चौड़ाई में पूरी तरह लॉक यानी फंसा हुआ है. दोनों प्लेट्स एक-दूसरे के खिलाफ 18 मिलीमीटर प्रति साल की रफ्तार से दबाव डाल रही हैं, लेकिन फिसल नहीं पा रही हैं. नतीजा यह है कि ऊपरी हिमालय हर साल 4 से 6 मिलीमीटर ऊपर उठ रहा है. शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस तरह जमा हो रही ऊर्जा हर 100 साल में एक 8.1 तीव्रता वाले बड़े भूकंप के बराबर है.
जमीन के नीचे दो विशाल प्लेट्स हैं. भारतीय प्लेट उत्तर की तरफ सरक रही है. तिब्बती प्लेट के नीचे घुसने की कोशिश कर रही है. सामान्य हालत में ये प्लेट्स धीरे-धीरे सरकती रहती हैं. लेकिन जब फॉल्ट लॉक हो जाता है तो सरकना बंद हो जाता है. दबाव बढ़ता रहता है. रबर बैंड की तरह खिंचता रहता है.
जब यह रबर बैंड टूटता है तो अचानक बहुत बड़ी हलचल होती है. यही भूकंप है. उत्तराखंड में यह फॉल्ट लंबे समय से लॉक है. वैज्ञानिक इस इलाके को सेंट्रल हिमालयन सिस्मिक गैप कहते हैं. यहां पिछले कई सौ सालों से कोई बहुत बड़ा भूकंप नहीं आया. इसलिए ऊर्जा लगातार जमा होती जा रही है.
पहले वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर मतभेद था कि उत्तराखंड में फॉल्ट कितना कसकर फंसा है. कुछ कहते थे कि आंशिक रूप से फंसा है, कुछ कहते थे पूरी तरह. नई स्टडी ने दोनों तरफ के आंकड़े मिलाकर साफ कर दिया है कि गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में फॉल्ट मजबूती से लॉक है.
GNSS स्टेशनों से मिली हॉरीजोंटल हलचल और सैटेलाइट से मिली वर्टिकल यानी ऊपर-नीचे की हलचल दोनों एक ही बात कह रही हैं. मॉडल बनाकर देखने पर भी यही नतीजा निकला कि फॉल्ट बहुत कसकर जुड़ा हुआ है.
शोधकर्ता साफ चेतावनी देते हैं कि इंडो-गंगेटिक प्लेन यानी गंगा-यमुना के मैदानी इलाके भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं. इन मैदानों में भारत की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है. दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, पटना जैसे बड़े शहर भी इसी क्षेत्र में हैं. बड़े भूकंप की लहरें सैकड़ों किलोमीटर दूर तक पहुंच सकती हैं. पुरानी इमारतें, कमजोर पुल और घनी आबादी वाले इलाके ज्यादा नुकसान उठा सकते हैं.
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के भूविज्ञानी डॉ. नरेश कुमार कहते हैं कि भूकंप कब आएगा यह कोई नहीं बता सकता. लेकिन हिमालय में 7.5 से 8 तीव्रता का भूकंप आना तय है. सवाल सिर्फ समय का है. यह स्टडी भी यही कहती है. वह तारीख या साल नहीं बताती. लेकिन इतना जरूर कहती है कि तैयारी करने का इंतजार नहीं किया जा सकता.
स्टडी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश तैयारी का है. उत्तराखंड में पहाड़ी ढलानों पर लगातार इमारतें बन रही हैं. कई जगह बिल्डिंग कोड का पालन नहीं हो रहा. पुरानी इमारतें कमजोर हैं. स्कूल और अस्पताल भी कई जगह सुरक्षित नहीं हैं. अगर बड़ा भूकंप आता है तो नुकसान बहुत ज्यादा हो सकता है.
इसलिए सबसे पहले भूकंप रोधी निर्माण नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए. पुरानी और कमजोर इमारतों का सर्वे होना चाहिए. स्कूल, अस्पताल और सरकारी इमारतों को मजबूत बनाना चाहिए. हर शहर और गांव में आपदा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था होनी चाहिए. लोगों को जागरूक करना चाहिए कि भूकंप आने पर क्या करना है.
सरकार और स्थानीय प्रशासन को मिलकर काम करना होगा. निर्माण की अनुमति देते समय भूगर्भीय सर्वे को अनिवार्य बनाना चाहिए. पर्यटन के नाम पर बेतरतीब निर्माण रोकना चाहिए. नदियों के किनारे और ढलान वाली जगहों पर ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. साथ ही वैज्ञानिक निगरानी को और मजबूत करना चाहिए. ज्यादा GNSS स्टेशन लगाए जाएं और सैटेलाइट आंकड़ो
ं की नियमित जांच हो.
वैज्ञानिक तरीके से ऊर्जा का अनुमान कैसे लगाया गया
शोधकर्ताओं ने दो तरह के आंकड़ों का इस्तेमाल किया. पहला GNSS यानी सैटेलाइट आधारित पोजिशनिंग सिस्टम. इससे जमीन की हॉरीजोंटल यानी दाएं-बाएं और आगे-पीछे की हलचल मापी गई. दूसरा जापान के ALOS-2 सैटेलाइट से इनसार तकनीक. इससे जमीन के ऊपर उठने या धंसने की दर निकाली गई.
दोनों आंकड़े मिलाकर उन्होंने एक मॉडल बनाया जिसे इलास्टिक सबडक्टिंग प्लेट मॉडल कहते हैं. इस मॉडल ने दोनों तरह की हलचलों को सही तरीके से समझाया. इससे साफ हुआ कि फॉल्ट 115 किलोमीटर चौड़ाई तक लॉक है. हर साल करीब 18 मिलीमीटर का स्लिप डेफिसिट यानी फिसलन की कमी हो रही है.
ऊपरी हिमालय 4 से 6 मिलीमीटर प्रति साल ऊपर उठ रहा है. ये आंकड़ें बताते हैं कि जमा हो रही ऊर्जा हर शताब्दी में एक 8.1 तीव्रता के भूकंप के बराबर है. यह अनुमान औसत है. कभी-कभी छोटा भूकंप ऊर्जा का कुछ हिस्सा निकाल देता है. कभी-कभी ऊर्जा और ज्यादा जमा हो जाती है. इसलिए सटीक भविष्यवाणी असंभव है. लेकिन खतरा साफ है.
इतिहास से सबक और भविष्य की राह
हिमालय क्षेत्र में पहले भी बड़े भूकंप आ चुके हैं. 1905 का कांगड़ा भूकंप, 1934 का बिहार-नेपाल भूकंप और 2015 का नेपाल भूकंप याद दिलाते हैं कि नुकसान कितना बड़ा हो सकता है. उत्तराखंड में 1991 का उत्तरकाशी और 1999 का चमोली भूकंप भी हुए थे, लेकिन वे इस संभावित बड़े भूकंप से छोटे थे. सेंट्रल सिस्मिक गैप लंबे समय से चुप है. इसलिए वैज्ञानिक इसे खास ध्यान से देख रहे हैं.
आम आदमी के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन लापरवाही भी नहीं. घर बनाते समय मजबूती का ध्यान रखें. पुराने घरों की मरम्मत करवाएं. परिवार के साथ भूकंप ड्रिल करें. सरकारी चेतावनियों पर ध्यान दें. मीडिया और सोशल मीडिया पर गलत अफवाहों से बचें. वैज्ञानिक स्टडीज को गंभीरता से लें.
यह स्टडी हमें याद दिलाती है कि प्रकृति अपनी गति से चलती है. हम उसे रोक नहीं सकते, लेकिन उसके असर को कम जरूर कर सकते हैं. उत्तराखंड के नीचे ऊर्जा जमा हो रही है. यह सच्चाई है. अब सवाल यह है कि हम कितनी जल्दी और कितनी गंभीरता से तैयारी करते हैं. पहाड़ों की खूबसूरती बनाए रखने के साथ उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी. तभी आने वाली पीढ़ियां इन पहाड़ों में सुरक्षित रह सकेंगी.
स्टडी का पूरा शीर्षक है – एविडेंस ऑफ स्ट्रॉन्ग प्लेट कपलिंग इन द उत्तराखंड हिमालयाज: कंस्ट्रेंट्स फ्रॉम GNSS एंड ALOS-2 इनसार ऑब्जर्वेशन्स. लेखक हैं दिब्यशक्ति पंडा, मृदुल यादव, एरिक ओ. लिंडसे और जी. श्रीनिवास राव. यह शोध हिमालयी क्षेत्र की भूकंप संभावनाओं को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है और नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश छोड़ता है – तैयारी में देरी न करें.

Nandni sharma

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