उत्तराखंड के मंडुआ, झंगोरा, चौलाई और कोदा जैसे स्थानीय अनाजों के पोषक तत्वों पर शोध जारी: डॉ. भारती कुलकर्णी
कम उम्र से ही स्वस्थ खान-पान की आदतों का विकास किया जाना चाहिए: डॉ. भारती कुलकर्णी, निदेशक (आईसीएमआर-राष्ट्रीय पोषण संस्थान)
आईसीएमआर-एनआईएन ने पोषण अनुसंधान, जन स्वास्थ्य शिक्षा और राष्ट्रीय नीतियों में योगदान की दी जानकारी
देहरादून/हैदराबाद – बुधवार को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत पीआईबी देहरादून द्वारा आयोजित हैदराबाद प्रेस दौरे के दूसरे दिन उत्तराखंड के 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पोषण संस्थान (आईसीएमआर-एनआईएन), हैदराबाद का दौरा किया। इस दौरे के दौरान पत्रकारों को पोषण अनुसंधान, जन स्वास्थ्य शिक्षा तथा राष्ट्रीय नीतियों एवं कल्याणकारी कार्यक्रमों के निर्माण में संस्थान के योगदान की जानकारी मिली।
प्रतिनिधिमंडल को संबोधित करते हुए हैदराबाद स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय पोषण संस्थान की निदेशक डॉ. भारती कुलकर्णी ने खाद्य संरचना, पोषक तत्वों की आवश्यकताओं तथा आहार संबंधी दिशा-निर्देशों पर वैज्ञानिक प्रमाण तैयार करने में संस्थान की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इंडियन फूड कंपोजिशन टेबल्स देश में उपलब्ध विभिन्न खाद्य पदार्थों में ऊर्जा, प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्वों और खनिजों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराती हैं। यह जानकारी शोधकर्ताओं, खाद्य उद्योग तथा जन स्वास्थ्य नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोगी है।
डॉ. कुलकर्णी ने भारतीयों के लिए पोषक तत्वों आवश्यकता और रिकमेंडेड डायटरी प्लान के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि ये विभिन्न आयु वर्गों एवं शारीरिक अवस्थाओं के लिए पोषण संबंधी आवश्यकताओं का आधार निर्धारित करते हैं।
भारतीयों के लिए आहार संबंधी दिशा-निर्देश के प्रमुख पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ. कुलकर्णी ने कहा कि स्वस्थ खान-पान की आदतों का विकास बचपन की शुरुआती अवस्था से ही किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के आहार में अतिरिक्त चीनी के सेवन से बचने संबंधी दिशा-निर्देश का उल्लेख किया।
कुपोषण के दोहरे बोझ पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. कुलकर्णी ने विशेष रूप से बच्चों में बढ़ते अधिक वजन और मोटापे की समस्या का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि निष्क्रिय जीवनशैली तथा वसा, चीनी और नमक की अधिक मात्रा वाले खाद्य पदार्थों का अत्यधिक सेवन इस समस्या के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। उन्होंने खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि केवल भोजन की उपलब्धता पोषण संबंधी बेहतर स्थिति सुनिश्चित नहीं करती। इसके लिए आहार में विविधता तथा व्यवहार में सकारात्मक बदलाव भी आवश्यक हैं।
डॉ. कुलकर्णी ने बताया कि उत्तराखंड के स्थानीय कृषि उत्पादों एवं मोटे अनाजों, जिनमें मंडुआ, झंगोरा, चौलाई और कोदा शामिल हैं, के विशिष्ट पोषक तत्वों का अध्ययन करने के लिए शोध किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रागी (फिंगर मिलेट) के सेवन से एनीमिया में कमी पर इसके प्रभाव का आकलन करने के लिए नैदानिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन भी जारी हैं।
मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने आईसीएमआर-एनआईएन के पोषण सूचना, संचार एवं स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग के प्रमुख एवं वैज्ञानिक-जी डॉ. सुब्बा राव द्वारा आयोजित तकनीकी सत्रों में भी भाग लिया।
डॉ. सुब्बा राव ने वर्तमान पोषण संबंधी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए अल्पपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी तथा जीवनशैली से संबंधित चयापचय संबंधी विकारों के एक साथ मौजूद होने की स्थिति को समझाया। उन्होंने वैज्ञानिक पोषण संबंधी जानकारी और आम लोगों की दैनिक खान-पान की आदतों के बीच अंतर को पाटने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने मीडिया प्रतिनिधियों से खाद्य संबंधी भ्रांतियों को दूर करने तथा प्रमाण-आधारित आहार संबंधी आदतों को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार पत्रकारिता करने का आह्वान किया।
प्रतिनिधिमंडल ने आईसीएमआर-एनआईएन की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं का भ्रमण किया तथा शोधकर्ताओं के साथ संवाद कर खाद्य विश्लेषण एवं लिपिड रसायन विज्ञान के क्षेत्र में चल रहे अनुसंधान कार्यों की जानकारी प्राप्त की।
इस दौरे पर प्रतिनिधिमंडल ने हैदराबाद प्रेस टूर के सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत सालार जंग संग्रहालय का दौरा किया। जहां पत्रकारों ने हैदराबाद की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत तथा संग्रहालय में संरक्षित ऐतिहासिक एवं अभिलेखीय संग्रहों के बारे में जानकारी प्राप्त की।
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