

देहरादून: निर्वाचन आयोग उत्तराखंड में एसआईआर से पहले प्री-एसआईआर अभियान चलाएगा, लेकिन बड़े पैमाने पर हुआ पलायन एसआईआर के लिए बड़ी चुनौती साबित होने वाला है। पहाड़ों में खाली हुए गांव हों या मैदानी क्षेत्र, जहां दस साल में मतदाताओं की संख्या में बड़ा बदलाव हुआ है। यहां वोटरों के साथ बीएलओ को भी चुनौती से जूझना पड़ेगा। एसआईआर में ऐसी शादीशुदा महिलाओं को खुद को मायके से साबित करना होगा। एसआईआर में ऐसी महिलाएं भी चुनौती होगी, जिनका मायका नेपाल है।
अभी प्री-एसआईआर में बीएलओ अपनी पहुंच हर मतदाता तक बनाएगा। लेकिन, उत्तराखंड के खाली हो चुके गांवों में मतदाता के सत्यापन को लेकर बीएलओ को माथापच्ची करनी होगी। खासतौर पर राज्य से बाहर जा चुके लोगों से संपर्क और प्रमाण जुटाना भी चुनौती से कम नहीं होगा। उत्तराखंड से पहले जिन राज्यों में एसआईआर हो चुका होगा, अगर वहां ऐसे प्रवासियों का नाम नहीं होगा तो भी उन्हें भी अपने नाम को उत्तराखंड में यथावत रखने के लिए गांव-घर में संपर्क की चुनौती से पार पाना होगा। मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम कहते हैं कि यूपी-दिल्ली में एसआईआर चल रहा है। उत्तराखंड से सबसे ज्यादा पलायन इन दोनों ही जगह है। ऐसे में उत्तराखंड में एसआईआर से पहले इन दोनों राज्यों की फाइनल सूची आ जाएगी।
मैदानी क्षेत्र की स्थितिएसआईआर का सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर पड़ेगा, जहां सबसे ज्यादा वोटर बढ़े हैं या फिर सबसे ज्यादा कम हुए हैं। उत्तराखंड में सबसे ज्यादा 12 ऐसी मैदानी सीटें हैं, जहां मतदाताओं की संख्या 72 फीसदी तक बढ़ी। यहां हाल के वर्षों में बढ़े वोटरों का 2003 की लिस्ट के रिकॉर्ड के साथ मिलान किया जाएगा। इन सीटों में धर्मपुर विस क्षेत्र शीर्ष पर हैं, जहां 10 साल में सर्वाधिक
वोटर बढ़े हैंइसके साथ ही डोईवाला, ऋषिकेश, सहसपुर, रुद्रपुर, कालाढुंगी, काशीपुर, रायपुर, किच्छा और भेल रानीपुर विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं।
पहाड़ी क्षेत्र का हालबढ़ती जनसंख्या और बाकी सीटों पर बढ़ते मतदाताओं के बीच उत्तराखंड में ऐसी भी विधानसभा सीटें हैं, जहां पर पलायन के कारण मतदाताओं की संख्या लगातार घट रही है। इन क्षेत्रों में सल्ट, रानीखेत, चौबट्टाखाल, लैंसडौन, पौड़ी, घनसाली, देवप्रयाग, केदारनाथ ऐसी सीटें हैं, जहां मतदाता कम हुए हैं। एसआईआर में इन सीटों पर भी नजर रहेगी। यहां के पुराने मतदाता वापस अपने घर-गांव में फिर से वोटर बनते हैं या फिर वोटर रहते हुए रोजगार के लिए बाहर गए लोग अपने नाम यथावत रख पाते हैं या नहीं, देखना होगा।
शादीशुदा महिलाओं को मायके से करना होगा साबितएसआईआर में ऐसी शादीशुदा महिलाओं को खुद को मायके से साबित करना होगा, जिनका नाम वर्ष 2003 की मतदाता सूची में ससुराल में दर्ज नहीं था। अगर उनका नाम तब मायके में दर्ज था, तो वोटर लिस्ट से यह जानकारी ससुराल क्षेत्र के बीएलओ को देनी होगी। मायके भी नाम नहीं था तो अपने माता-पिता, दादा-दादी के नाम के आधार पर खुद को सत्यापित करना होगा।
विदेशी बहुएं भी चुनौतीएसआईआर में ऐसी महिलाओं भी चुनौती होगी, जिनका मायका नेपाल है। क्योंकि, यह मामला उनकी नागरिकता से जुड़ा होगा। उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी पुरुषोत्तम का कहना है कि यह नागरिकता नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट के सत्यापन से जुड़ा मामला है। इसके लिए भारत निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन का ही पालन किया जाएगा।
