

देहरादून/ऋषिकेश: उत्तराखंड से मानवता और परिवार के दान से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। गंभीर बीमारी के कारण 9 दिन की बच्ची को जीवन तो नहीं मिला, लेकिन वो मरकर भी अमर हो गई। जिस नवजात की किलकारी से पूरा परिवार चहक उठा था, 9 दिन बाद ही उस परिवार की खुशियां गम में बदल गई। हालांकि नवजात के माता-पिता ने बच्ची का देहदान कर मानव कल्याण में सहयोगी बने। उत्तराखंड के ऋषिकेश से यह मार्मिक घटना हर किसी की आंखें नम कर रहा है।
श्रीनगर में चमोली के एक दंपती की 9 दिन पहले बेटी हुई तो पूरा परिवार खुशियों में डूब गया। हालांकि यह क्षण भर की खुशी ही साबित हुई। इस नन्ही परी को जन्मजात महावृहदांत्र रोग था, जिसमें आंतों में तांत्रिक गुच्चो का अभाव था। इस रोग से पीड़ित बच्ची को श्रीनगर से एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया था। जहां ऑपरेशन कर उसकी जान तो बचाई गई, लेकिन ऑपरेशन के 3 दिन बाद ही नवजात की रिफ्रैक्ट्री सेप्टिक शॉक के कारण मौत हो गई।
चिकित्सा शोध के लिए किया बच्ची का देहदानबच्ची की मौत से दुखी परिजनों ने जब बीमार बच्ची के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के बारे में एम्स ऋषिकेश के सीनियर नर्सिंग ऑफिसर मोहित और महिपाल से जानकारी ली। उन्होंने पीड़ित दंपती की मदद के लिए मोहन फाऊंडेशन उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा को सूचित किया।
इस दौरान संचित अरोड़ा ने दंपती को देहदान के महत्व के बारे में बताया और उन्हें मानव कल्याण में योगदान देने के लिए प्रेरित भी किया। उन्होंने दंपती को बताया कि यदि वे नन्ही परी का मृत देह दान करेंगे तो चिकित्सा शोध में कई कल्याणकारी कार्य हो सकेंगे। नन्ही बच्ची के माता-पिता इसके लिए ने अपनी सहमति दे दी। इसके बाद एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मुकेश मुकेश सिंगला और प्रोफेसर डॉक्टर रश्मि मल्होत्रा से संपर्क किया गया।
तकनीकी सहायक अजय रावत द्वारा आवश्यक कार्यवाही कर नवजात की देह को विभाग को सौंपा गया। इस दौरान नवजात की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। पीड़ित दंपत्ति द्वारा मानव कल्याण के में दिए गए योगदान को भी सराहा गया।
