
लोकतंत्र में न्यायपालिका को अधिकारों का संरक्षक और जनता के विश्वास का आधार माना जाता है। लेकिन जब पारदर्शिता और जवाबदेही की बात आती है, कई बार देखने को मिलता है की न्यायपालिका सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम को एक चुनौती के रूप में देखती है, खासकर जब सवाल उसकी अपनी जवाबदेही का हो। यह तनाव हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक बार फिर उजागर हुआ, जब आरटीआई आवेदक शोनी कपूर को जिला अदालत के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों का सांख्यिकीय डेटा देने से इनकार कर दिया गया। उच्च न्यायालय ने “ऐसा कोई डेटा नहीं रखा जाता है” और आरटीआई अधिनियम के तहत छूट का हवाला देते हुए जानकारी देने से मना कर दिया।यह कोई अकेली घटना नहीं है। इस तरह की प्रतिक्रियाएं न्यायिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यह समझने के लिए कि यह मुद्दा कितना गहरा और व्यवस्थागत है, हमें उत्तराखंड में लड़ी गई एक लंबी और महत्वपूर्ण लड़ाई को देखना होगा, जो इस प्रणालीगत समस्या की गहरी समझ प्रदान करती है।
*उत्तराखंड का मामला: पारदर्शिता के लिए जद्दोजहद*
यह मामला वरिष्ठ भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़ा है, उन्होंने 14 मई 2025 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के पास आरटीआई आवेदन दायर किया। इसमें चार मुख्य बिंदु थे:
1. उत्तराखंड की अधीनस्थ न्यायपालिका के आचरण को नियंत्रित करने वाले सेवा नियमों और अनुशासनात्मक कार्यवाही की प्रक्रियाओं की प्रमाणित प्रतियां।
2. भ्रष्टाचार या कदाचार की शिकायतें दर्ज करने की प्रक्रिया, नियम, सक्षम प्राधिकारी का विवरण और शिकायत फॉर्म आदि की प्रतियां।
3. 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 तक अधीनस्थ न्यायाधीशों/अधिकारियों के खिलाफ कुल शिकायतों की संख्या और उनमें से कितने मामलों में अनुशासनात्मक/आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की गई या अमल में लाई गई।
4. इस आरटीआई के प्रसंस्करण में उत्पन्न फाइल नोटिंग/दस्तावेजों की प्रतियां।
राज्य लोक सूचना अधिकारी (एसपीआईओ) ने 19 जून 2025 को जवाब दिया। पहले दो बिंदुओं पर जानकारी वेबसाइट लिंक और संलग्नक के रूप में दी गई, लेकिन बिंदु 3 पर जानकारी देने से इनकार कर दिया ।
उच्च न्यायालय के राज्य लोक सूचना अधिकारी (SPIO) ने इस जानकारी को देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यह “गोपनीय प्रकृति की और तीसरे पक्ष की जानकारी” है और उत्तराखंड उच्च न्यायालय सतर्कता नियम, 2019 द्वारा शासित है। सूचना अधिकारी ने यह भी जोड़ा कि आवेदक केवल उन शिकायतों की जानकारी मांग सकता है जो उसने स्वयं दायर की हों। जब चतुर्वेदी ने इस इनकार के खिलाफ पहली अपील दायर की, तो उसे भी 14 जुलाई, 2025 को खारिज कर दिया गया। अपीलीय प्राधिकारी ने अपने आदेश में कहा कि यह जानकारी आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत व्यक्तिगत और धारा 11 के तहत तीसरे पक्ष से संबंधित है, इसलिए इसे नहीं दिया जा सकता। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि आवेदक के पास इस जानकारी को मांगने का कोई ‘लोकस स्टैंडी’ या ‘प्रवर्तनीय कानूनी अधिकार’ (enforceable legal right) नहीं है। लेकिन उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद यह लड़ाई खत्म नहीं हुई, बल्कि राज्य के सर्वोच्च सूचना निगरानी निकाय तक पहुंच गई।
*एक महत्वपूर्ण मोड़: सूचना आयोग का हस्तक्षेप*
राज्य सूचना आयोग एक स्वतंत्र वैधानिक निकाय है, जिसका काम आरटीआई अधिनियम को लागू करना और यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक प्राधिकरण (इस मामले में उच्च न्यायालय) कानून का पालन करें। चतुर्वेदी का मामला जब उत्तराखंड सूचना आयोग के समक्ष अपील संख्या 43293/2025-26 के रूप में पहुंचा, तो यह एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।मुख्य सूचना आयुक्त श्रीमती राधा रतूड़ी ने 1 जनवरी, 2026 को एक ऐतिहासिक आदेश पारित किया। इस आदेश में, उन्होंने उच्च न्यायालय के लोक सूचना अधिकारी को आरटीआई आवेदन के बिंदु संख्या 3 में मांगी गई सांख्यिकीय जानकारी प्रदान करने का स्पष्ट निर्देश दिया।यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए गोपनीयता, तीसरे पक्ष की जानकारी और जनहित की कमी जैसे तर्कों को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। यह फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि एक वैधानिक निकाय (सूचना आयोग) ने एक संवैधानिक संस्था (उच्च न्यायालय) के प्रशासनिक निर्णय को पारदर्शिता के पक्ष में पलट दिया, जो RTI कानून की सर्वोच्चता को स्थापित करता है। आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल आंकड़ों की मांग करना, जिसमें किसी न्यायाधीश का व्यक्तिगत विवरण शामिल नहीं है, नागरिक के सूचना के अधिकार के दायरे में आता है और यह न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। उत्तराखंड में पारदर्शिता की यह जीत दिल्ली में चल रही बहस को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करेगी ।
