उत्तराखंड: उत्तराखंड के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं, पर्यटन, कृषि और रोजगार को लेकर बड़ा विजन पेश किया गया है। रिपोर्ट में खास तौर पर मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, पर्यटन को रोजगार का बड़ा माध्यम बनाने और कृषि को नगदी व औषधीय फसलों की ओर ले जाने पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार राज्य में मातृ और शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर पर लाने के लिए ‘केरल मॉडल’ अपनाने की सिफारिश की गई है। प्रमुख सचिव नियोजन आर. मीनाक्षीसुंदरम ने टिहरी के पिलखी क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताया कि पहाड़ी इलाकों में गर्भवती महिलाओं की मौत के पीछे सबसे बड़ी वजह हीमोग्लोबिन की कमी और पोषण का अभाव है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार अब केरल की तर्ज पर प्रत्येक गर्भवती महिला की डिजिटल ट्रैकिंग और विशेष पोषण कार्यक्रम लागू करने की योजना बना रही है। इसका उद्देश्य जोखिम की समय रहते पहचान कर मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करना है।
आर्थिक सर्वेक्षण में राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ‘ज्ञान’ फॉर्मूले का सुझाव भी दिया गया है। ‘ज्ञान’ का अर्थ है— गरीब, युवा, अन्नदाता (किसान) और नारी (महिला) के कल्याण पर केंद्रित विकास। रिपोर्ट के अनुसार यदि सरकार इन चार क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त 10 हजार करोड़ रुपये का निवेश करती है तो राज्य की आर्थिक विकास दर में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इसके साथ ही महिलाओं को पैतृक संपत्ति में सह-अंशधारी बनाकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का सुझाव भी बजट के लिए दिया गया है।
पर्यटन क्षेत्र में भी उत्तराखंड ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार राज्य गठन के समय जहां 4803 होटल थे, वहीं अब उनकी संख्या बढ़कर 10,509 हो गई है। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी होम स्टे क्षेत्र में देखी गई है। पिछले पांच वर्षों में होम स्टे की संख्या 3955 से बढ़कर 6161 तक पहुंच गई है। इसी तरह घरेलू पर्यटकों की संख्या में भी बड़ा उछाल आया है, जो 1.05 करोड़ से बढ़कर 6.01 करोड़ के पार पहुंच गई है।
चारधाम यात्रा भी पर्यटन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरी है। यात्रा में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 56 लाख से अधिक हो चुकी है। इस बढ़ती संख्या को देखते हुए राज्य में हेलीपोर्ट और हेलीपैड की संख्या में भी काफी वृद्धि की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
कृषि क्षेत्र में भी बदलाव के संकेत मिले हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखंड अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ नगदी और औषधीय पौधों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। पिछले चार वर्षों में औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती का रकबा 900 हेक्टेयर से बढ़कर लगभग 10,000 हेक्टेयर हो गया है, जो करीब 11 गुना वृद्धि को दर्शाता है। इसके अलावा गेहूं और चावल की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता भी पिछले 25 वर्षों में लगभग दोगुनी हो गई है।
स्वरोजगार के क्षेत्र में मत्स्य पालन भी तेजी से उभर रहा है। राज्य में मछली उत्पादन 7,325 टन से बढ़कर 10,487 टन तक पहुंच गया है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।
हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण में डेयरी सेक्टर की धीमी प्रगति पर चिंता भी जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में राज्य में प्रतिदिन 50.92 लाख लीटर दूध उत्पादन होता था, जो 2025 में बढ़कर 54.59 लाख लीटर तक ही पहुंच पाया है। सरकार अब इस क्षेत्र में विशेष प्रोत्साहन योजनाएं लागू कर दुग्ध उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने की तैयारी कर रही है।
इसके साथ ही रिपोर्ट में ऑल वेदर रोड परियोजना को गांवों की सहायक सड़कों तक विस्तार देने और माध्यमिक स्तर से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू करने की सिफारिश की गई है, ताकि शिक्षा को सीधे रोजगार से जोड़ा जा सके और युवाओं को स्थानीय स्तर पर अवसर मिल सकें।
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