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फायर सीजन के बीच वन विभाग में पुनर्गठन की आहट, कर्मचारियों के विरोध से बढ़ी चिंता – पर्वतजन

फायर सीजन के बीच वन विभाग में पुनर्गठन की आहट, कर्मचारियों के विरोध से बढ़ी चिंता
उत्तराखंड में वनाग्नि के मौसम की शुरुआत होते ही वन विभाग ने अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है. इसी बीच विभागीय ढांचे में प्रस्तावित बदलाव को लेकर सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच मतभेद उभर कर सामने आए हैं. एक ओर शासन प्रशासनिक दक्षता और बेहतर निगरानी व्यवस्था के नाम पर डिवीजन और रेंज स्तर पर संरचनात्मक पुनर्संरचना पर विचार कर रहा है, वहीं कर्मचारी संगठन इसे जल्दबाजी में लिया जा रहा निर्णय बता रहे हैं. ऐसे में यदि आग के संवेदनशील दौर में कोई बड़ा फैसला लागू होता है, तो तैयारियों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
राज्य में हर वर्ष मार्च से जून के बीच जंगलों में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं. पहाड़ी इलाकों और तराई क्षेत्र में सूखी पत्तियां, चीड़ की सुइयां और बढ़ते तापमान के कारण आग फैलने का खतरा अधिक रहता है. इस वर्ष भी फायर सीजन शुरू हो चुका है और विभाग अलर्ट मोड में है. विभिन्न स्थानों पर कंट्रोल रूम सक्रिय किए जा रहे हैं, फायर वॉचर्स की तैनाती की प्रक्रिया चल रही है तथा संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाई जा रही है. ऐसे समय में संगठनात्मक बदलाव की चर्चा ने विभाग के भीतर असहजता पैदा कर दी है.

सूत्रों के मुताबिक शासन स्तर पर वन क्षेत्रों के पुनर्गठन की तैयारी काफी हद तक पूरी हो चुकी है. प्रस्तावित व्यवस्था में कुछ डिवीजनों के पुनर्समायोजन, नई रेंजों के गठन और कुछ इकाइयों के विलय की संभावना जताई जा रही है. सरकार का तर्क है कि वर्तमान संरचना कई स्थानों पर भौगोलिक और प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप नहीं है, जिससे कार्यकुशलता प्रभावित होती है. पुनर्गठन से संसाधनों के बेहतर उपयोग और निगरानी तंत्र को अधिक प्रभावी बनाने का दावा किया जा रहा है.
हालांकि जैसे ही इस प्रस्ताव की चर्चा सामने आई, कर्मचारी संगठनों में नाराजगी दिखाई देने लगी. उनका कहना है कि जमीनी स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों से संवाद किए बिना इस तरह का निर्णय लेना उचित नहीं है. संगठनों का आरोप है कि यदि बिना परामर्श के बदलाव लागू किए गए तो इससे कर्मचारियों की पदस्थापना, जिम्मेदारियों और कार्यक्षेत्र में असंतुलन की स्थिति बन सकती है.
उत्तराखंड फॉरेस्टर संघ के प्रदेश अध्यक्ष स्वरूप चंद्र रमोला ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने कर्मचारियों की राय को दरकिनार कर पुनर्गठन लागू किया तो व्यापक विरोध होगा. उनका कहना है कि विभाग पहले ही स्टाफ की कमी से जूझ रहा है, कई पद रिक्त हैं और ऐसे संवेदनशील समय में ढांचे में बदलाव से भ्रम और अव्यवस्था की आशंका बढ़ सकती है.
कर्मचारियों का यह भी मत है कि पुनर्गठन के नाम पर किए जाने वाले परिवर्तन से पदस्थापन के अवसर सीमित हो सकते हैं. वनाग्नि नियंत्रण जैसे कार्यों में स्थानीय अनुभव और क्षेत्र की गहन समझ बेहद महत्वपूर्ण होती है. यदि कर्मचारियों में असंतोष या आंदोलन की स्थिति बनी तो आग से निपटने की रणनीति प्रभावित हो सकती है.
बताया जा रहा है कि विभिन्न कर्मचारी संगठन इस मुद्दे पर आपसी विमर्श कर रहे हैं और साझा रणनीति तैयार करने पर विचार कर रहे हैं. यदि मामला आंदोलन तक पहुंचता है, तो यह विभाग के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है, विशेषकर ऐसे समय में जब तापमान लगातार बढ़ रहा है और आग की घटनाओं की आशंका बनी हुई है.
सरकार के सामने फिलहाल दोहरी जिम्मेदारी है, एक ओर दीर्घकालिक प्रशासनिक सुधार और दूसरी ओर मौजूदा फायर सीजन की संवेदनशीलता. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ानी है तो पहले कर्मचारियों के साथ प्रभावी संवाद स्थापित करना आवश्यक होगा. साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वनाग्नि प्रबंधन पर किसी प्रकार की प्रशासनिक अस्थिरता का प्रभाव न पड़े.
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस विषय पर कब और किस रूप में निर्णय लेती है. यदि समय रहते सहमति का रास्ता नहीं निकला, तो वनाग्नि जैसी गंभीर चुनौती के बीच विभाग को अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ सकता है.

Sapna Rani

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