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उत्तराखंड में गैस सिलेंडर की दिक्कत के बीच याद आया पुराना तरीका! पहाड़ों में फिर जलने लगे लकड़ी के चूल्हे – myuttarakhandnews.com

पिथौरागढ़: उत्तराखंड में इन दिनों गैस सिलेंडर को लेकर आम जनता को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. इस संकट के बीच कई गांवों में लोग एक बार फिर अपने पुराने पारंपरिक तरीकों को याद करने लगे हैं. पहले के समय में पहाड़ों के लगभग हर घर में मिट्टी और पत्थर का चूल्हा हुआ करता था, जो न केवल खाना बनाने का जरिया था बल्कि पूरे परिवार के मेल-जोल का केंद्र भी होता था.
जंगल से मिलता था मुफ्त ईंधनपुराने समय में ईंधन के लिए पहाड़ों में कभी जेब खाली नहीं करनी पड़ती थी. जंगलों और खेतों के आसपास मिलने वाली सूखी लकड़ियां, पिरूल (चीड़ के सूखे पत्ते) और उपलों का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जाता था. गांव की महिलाएं दिनभर के कामकाज के साथ-साथ आसानी से इन चीजों को इकट्ठा कर लिया करती थीं. इस तरीके से जहां एक ओर रसोई का खर्च शून्य रहता था, वहीं दूसरी ओर चूल्हे पर धीमी आंच में पके खाने का स्वाद और खुशबू आज भी लोगों की जुबान पर बसी हुई है.
महंगाई के दौर में ‘डबल सिस्टम’ का सहाराअब जब गैस सिलेंडर की कीमतें बजट बिगाड़ रही हैं, तो कई परिवारों ने एक बीच का रास्ता निकाल लिया है. कई घरों में अब गैस के साथ-साथ पारंपरिक चूल्हा भी जलाया जा रहा है. इससे न केवल गैस की बचत हो रही है, बल्कि सिलेंडर खत्म होने या देरी से आने पर खाना बनाने की टेंशन भी खत्म हो गई है. मुश्किल समय में यह सिस्टम पहाड़ के लोगों के लिए एक सुरक्षित और सस्ता विकल्प साबित हो रहा है.
बुजुर्गों का अनुभव आज भी है काम कागांव की रहने वाली नर्वदा देवी कहती हैं कि पुराने समय के तरीके आज भी बहुत काम के हैं. उनका कहना है, “पहले हमारे पास गैस नहीं थी, हम लकड़ी के चूल्हे पर ही सब कुछ बनाते थे. जंगल से सूखी लकड़ी और पिरूल ले आते थे और काम चल जाता था. अब जब गैस महंगी हो गई है, तो हमने फिर से चूल्हा जलाना शुरू कर दिया है. पहाड़ में रहने वालों के लिए ये पुराने तरीके आज भी उतने ही असरदार हैं.”
पहाड़ के पारंपरिक तरीके सिर्फ पुराने जमाने की यादें भर नहीं हैं, बल्कि संकट के समय आज भी सबसे बड़े मददगार हैं. बदलते दौर में भले ही नई तकनीकों ने जगह बना ली हो, लेकिन पहाड़ की जीवनशैली में पूर्वजों की समझ और आत्मनिर्भरता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

Nandni sharma

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