
नई दिल्ली, 22 जनवरी 2026: भारत की विविध सांस्कृतिक धरोहर और आत्मनिर्भरता की भावना को समर्पित भारत पर्व में इस वर्ष उत्तराखंड अपनी आकर्षक झांकी पेश करेगा, जिसका मुख्य विषय ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ है। दर्शक 26 से 31 जनवरी तक दिल्ली के प्रसिद्ध लाल किले में राज्य की प्रगति की कहानी को करीब से देख सकेंगे। यह प्रदर्शनी आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से जुड़कर उत्तराखंड की सांस्कृतिक संपदा, आर्थिक मजबूती और प्राचीन परंपराओं की स्वावलंबन को उजागर करती है।
उत्तराखंड सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक और झांकी के प्रभारी अधिकारी केएस चौहान ने जानकारी दी कि झांकी के आगे के हिस्से में पारंपरिक संगीत वाद्यों ‘ढोल’ और ‘रणसिंघा’ की तांबे से बनी प्रभावशाली प्रतियां रखी गई हैं। ये राज्य की जीवंत सांस्कृतिक परंपरा और कारीगरों की उत्कृष्ट कला कौशल का प्रतिनिधित्व करती हैं।
तांबे की कला की सूक्ष्मता आएगी सामने: ट्रेलर के प्रारंभिक भाग में ‘तांबे के मंजीरे’ की एक विशाल प्रतिमा प्रदर्शित है, जो तांबे की शिल्पकला की बारीकियों को विस्तार से दिखाती है। इसके साथ ही मध्य भाग में सुंदर ढंग से तैयार तांबे के बर्तनों जैसे ‘गागर’, ‘सुराही’ और ‘कुंडी’ को जगह दी गई है, जो उत्तराखंड के पारंपरिक घरेलू जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं।
इस हिस्से के निचले और बगल के पैनलों को पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘भंकोर’ के प्रमुख चित्रों से सजाया गया है, जो सांस्कृतिक कथा को और गहराई प्रदान करते हैं। झांकी के अंतिम भाग में ‘तांबे के कारीगर’ की एक मनमोहक मूर्ति स्थापित है, जो हाथों से तांबे के बर्तन गढ़ने की प्रक्रिया में लगा हुआ है।
कारीगर के आसपास बारीकी से तैयार तांबे के सामान रखे हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे ज्ञान, हुनर और परिश्रम की मर्यादा को प्रतिबिंबित करते हैं। कुल मिलाकर, यह झांकी उत्तराखंड के शिल्पकारों की कला, सांस्कृतिक योगदान, आर्थिक स्वतंत्रता, रोजगार, कौशल और रिवाजों को शानदार तरीके से प्रस्तुत करती है।
चौहान ने कहा कि यह झांकी देवभूमि की गहन सांस्कृतिक विरासत को पुरानी शिल्पकला के माध्यम से जीवंत बनाती है, जो आज भी समाज में जीवित है। स्थानीय कारीगरों द्वारा पारंपरिक विधियों से निर्मित तांबे के बर्तन और औजार न सिर्फ श्रेष्ठ शिल्प का नमूना हैं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में उनका खास स्थान है।
सदियों से ये शिल्प उत्पाद घरेलू जरूरतों के साथ-साथ पारंपरिक रस्मों का अविभाज्य हिस्सा बने हुए हैं, जो उत्तराखंड की समृद्ध परंपराओं और रचनात्मक धरोहर को बखूबी दर्शाते हैं। विशेष रूप से शिल्पकार समुदाय के कई परिवारों के लिए यह प्राचीन कला सिर्फ सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि कमाई का प्रमुख साधन भी है।
इस साल कर्तव्य पथ पर नहीं दिखेगी उत्तराखंड की झांकी: ध्यान रहे कि इस बार 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड में कर्तव्य पथ पर उत्तराखंड की झांकी शामिल नहीं होगी। वर्ष 2025 में राज्य ने ‘सांस्कृतिक धरोहर और साहसिक खेल’ पर आधारित झांकी प्रस्तुत की थी। वहीं, 2023 में ‘मानसखंड’ झांकी ने प्रथम स्थान हासिल किया था।
