देहरादून। केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में कार्यरत गैर टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) योग्यताधारी शिक्षकों की संख्या और विवरण राज्य सरकार से मांगा है। इसका उद्देश्य यह जानना है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से देशभर में कितने शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं, ताकि उसके आधार पर केंद्र सरकार कोई विधायी या नीतिगत निर्णय ले सके। इस क्रम में शिक्षा विभाग अपने यहां कार्यरत बिना टीईटी शिक्षकों का रिकॉर्ड एकत्र कर केंद्र को भेजने की तैयारी में जुट गया है।
प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय का अनुमान है कि राज्य में करीब 13 हजार से अधिक शिक्षक सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जद में हैं, जिन्होंने टीईटी नहीं की है। लेकिन एक भी शिक्षक छूट न पाए इसलिए जनपदवार आंकड़े मांगे गए हैं। गौरतलब है कि एक सितंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा एक से आठ तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य करने का फैसला सुनाया था।
इस फैसले के बाद देश के कई राज्यों के शिक्षकों की वर्षों की नौकरी पर तलवार लटक गई। शिक्षकों ने इसका कड़ा विरोध किया। उत्तराखंड सरकार ने भी अन्य राज्यों की तर्ज पर पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की है। सभी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई आवश्यक होने के कारण अभी अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।
वर्ष 2010 से पूर्व शिक्षक निर्धारित योग्यताधारी
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने 23 अगस्त, 2010 से टीईटी अनिवार्य किया था। इससे पहले नियुक्त शिक्षक अपनी निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के आधार पर विधिवत चयनित हुए थे। ऐसे में पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी की बाध्यता थोपना न्यायसंगत नहीं है। शिक्षकों की मांग है कि 23 अगस्त, 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी अनिवार्यता से मुक्त रखा जाए।
पुराने शिक्षकों को टीइटी से राहत की उठी मांग
अखिल भारतीय जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ के राष्ट्रीय महामंत्री सुभाष चौहान ने केंद्र से अध्यादेश लाकर पुराने शिक्षकों को टीईटी से राहत देने की मांग की। उत्तराखंड जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष विनोद थापा ने कहा कि इस फैसले से शिक्षक मानसिक रूप से परेशान हैं और इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। उन्होंने 50 वर्ष की आयु में परीक्षा की बाध्यता को उत्पीड़न बताया।
प्रधानाचार्य सीमित विभागीय परीक्षा भी स्थगित
सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रारंभिक शिक्षा के अध्यापकों के लिए टीईटी अनिवार्य करने के निर्णय के बाद राज्य में प्रधानाचार्यों के रिक्त 692 पदों के लिए सीमित विभागीय परीक्षा को शासन से स्थगित कर दिया, जबकि राज्य के 1385 राजकीय इंटर कॉलेजों में से केवल 208 विद्यालयों में ही नियमित प्रधानाचार्य रह गए हैं। प्रधानाचार्य परीक्षा के पात्र कई एलटी शिक्षकों ने टीईटी पास नहीं किया है, ऐसे में उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने परीक्षा स्थगित करने का निर्णय लिया।
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