समय के चक्र को पीछे लौटा कर सियासी चमत्कार कर दिखाने की सोच असल में समझ के दिवालियेपन का संकेत देती है। इस प्रयास में कांग्रेस ने सबकी पार्टी होने की अपनी विशिष्ट पहचान को संदिग्ध बना दिया है। चूंकि विचारधारा और जन-गोलबंदी के मोर्चों पर कांग्रेस नेतृत्व दीर्घकालिक रणनीति के जरिए राजनीति की नई समझ बनाने में विफल है, इसलिए अक्सर वह चुनाव जीतने के ऐसे टोना-टोटकों करने में लग जाता है, जिनके सफल होने की कोई गुंजाइश नहीं होती। हाल में उसने जातीय जनगणना और अस्मिता की राजनीति के ऐसे टोटके अपनाए हैँ। इसके पीछे सोच संभवत: यह है कि अगर जातीय विभाजन रेखा हिंदुओं के बीच राजनीतिक विमर्श का मुख्य बिंदु बन जाए, तो भाजपा की हिंदुत्व की सियासत को हराया जा सकता है।
यह मुद्दा अपनाते वक्त कांग्रेस (यह बात अन्य तमाम विपक्षी दलों पर भी लागू होती है) ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि आखिर जातीय न्याय की राजनीति उसका ट्रंप कार्ड कैसे हो सकती है, क्योंकि इससे खुद उसके अपने रिकॉर्ड पर कई सवाल उठेंगे। राहुल गांधी अगर कहते हैं कि सेक्रेटरी स्तर पर आज ओबीसी के सिर्फ तीन अधिकारी हैं, तो यह प्रश्न उनसे भी पूछा जाएगा कि इसके लिए कांग्रेस की कितनी जिम्मेदारी नहीं बनती है?
बहरहाल, मसला सिर्फ इतना नहीं है। इससे अधिक अहम बात यह है कि भाजपा अगर आज देश के एक बड़े हिस्से में अपराजेय मालूम पड़ती है, तो उसका एक प्रमुख कारण यह है कि जातीय प्रतिनिधित्व की आकांक्षाओं को उसने अपनी हिंदुत्व राजनीति के बड़े तंबू के अंदर समेट लिया है। इस तरह वह 1990 के दशक में उभरी मंडलवादी राजनीति की काट तैयार कर चुकी है। हकीकत यह है कि उत्तर भारत में आज ओबीसी मतदाताओं का सबसे बड़ा हिस्सा भाजपा का समर्थक है। दलित और आदिवासी समुदायों में भी उसकी पीठ अब काफी मजबूत हो चुकी है। इसके बीच समय के चक्र को पीछे लौटा कर सियासी चमत्कार कर दिखाने की सोच असल में समझ के दिवालियेपन का संकेत देती है। उधर इस प्रयास में कांग्रेस ने सबकी पार्टी होने के अपने यूएसपी को संदिग्ध बना दिया है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में यह रणनीति आत्मघाती साबित हुई। क्या कांग्रेस अब ताजा चुनाव नतीजों से कोई सबक लेगी? इसकी संभावना कम है, क्योंकि दूसरा रास्ता श्रमसाध्य राजनीति का है, जिसके लिए विपक्ष अभी तैयार नहीं है।
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