धामी सरकार को बदनाम करने के लिए विकास विरोधियों का षड्यंत्र !

पहले मोदी, फिर योगी…अब निशाने पर पुष्कर धामी !
लेकिन कांग्रेस शासित तेलंगाना सरकार के एक साल के ₹ 776 करोड़ के सूचना विभाग बजट पर चुप्पी
उत्तराखंड को नहीं देखना चाहते विकास पथ आगे बढ़ना तो गढ़े जा रहे झूठे नैरेटिव !
सूचना और दुष्प्रचार में फर्क समझना जरूरी !
देश में जब-जब किसी राज्य या नेतृत्व ने ईमानदारी से विकास की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए हैं, तब-तब कुछ प्लेटफ़ॉर्म या समूहों ने उस प्रयास को संदेह और नकारात्मकता के घेरे में लाने की कोशिश की है। यह पैटर्न नया नहीं है बस पात्र और स्थान बदलते रहते हैं। एकन्यूज़ वेबसाइट ने भी इसी राह पर चलते हुए हर बार विरोधियों के इशारे पर झूठे नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब देश ने डिजिटल ट्रांजेक्शन, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत जैसी योजनाओं से विश्व पटल पर नई पहचान बनाई, तब भी कुछ विश्लेषण और रिपोर्टें केवल कमियां खोजने में व्यस्त रहीं और तब भी साल 2022 में विरोधियों के इशारों पर इस वेबसाइट ने झूठे नैरेटिव बनाते हुए टूल किट का काम किया।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जब कानून व्यवस्था सुधरी, निवेश बढ़ा और रोजगार सृजन हुआ, तब भी इसी वेबसाइट ने वर्ष 2021 में सरकार पर विज्ञापन, छवि निर्माण या पक्षपात के आरोप लगाए जबकि ज़मीन पर आम जनता ने बदलाव महसूस किया। अब वही प्रवृत्ति उत्तराखंड में देखी जा रही है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य न केवल निवेश और पर्यटन में नई ऊँचाइयाँ छू रहा है, बल्कि भ्रष्टाचार पर सख्ती, समान नागरिक संहिता, लैंड जिहाद पर कठोर कार्रवाई, 25000 से अधिक रिकार्ड सरकारी भर्तियां, सख्त धर्मांतरण कानून और उपद्रवियों पर कड़ी नकेल कसने जैसे ऐतिहासिक निर्णयों से भी एक मिसाल कायम कर रहा है। लेकिन जब विकास की गति बढ़ती है, तो भ्रम फैलाने वाली राजनीति भी सक्रिय हो जाती है, रिपोर्टों और लेखों के ज़रिए ऐसे नैरेटिव गढ़े जाते हैं जिनका उद्देश्य तथ्यों से अधिक धारणा बनाना होता है। यहां भी यही हुआ जब उत्तराखंड में कोई मुद्दा नहीं मिला तो उन्होंने अपनी टूल किट को एक्टिव करते हुए उसी वेबसाइट के जरिए फेक नेरेटिव करते हुए उत्तराखंड में भ्रम की राजनीति का जाल बिछा दिया।
सवाल यही है, जब कोई सरकार या नेता अपने काम के बल पर जनता के बीच विश्वास बना रहा होता है, तब कुछ समूह क्यों चाहतें हैं कि उस भरोसे को डगमगाया जाए? लोकतंत्र में सवाल पूछना ज़रूरी है, लेकिन सवालों के पीछे मंशा भी उतनी ही अहम होती है। अगर मंशा विकास को रोकना, या भ्रम फैलाना बन जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। जनता के लिए यही सबसे बड़ा सबक है सूचना और दुष्प्रचार में फर्क समझना ही सच्ची जागरूकता है।

shivani Rawat

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