देहरादून : एक बार फिर से खतरे में खलंगा रिजर्व फॉरेस्ट ! 40 बीघा जमीन पर कब्जे का लग रहा आरोप : – myuttarakhandnews.com

देहरादून : खलंगा रिजर्व फॉरेस्ट एक बार फिर चर्चाओं में है ,पिछले साल ही यहाँ एक विशाल जन आंदोलन हुआ था जब उक्त जंगल मे एक सरकारी योजना के लिए 1800 पेड़ो का कटान करने की तैयारी थी ।तब जन जागरूकता व आंदोलन ये ये जंगल बचा था ।
वहीं वर्तमान में आरोप है कि नालापानी – खलंगा के साल वन के 40 बीघा क्षेत्र को कुछ भू माफिया कब्जाने की कोशिश में लगे है ।जमीन पर किसी अशोक अग्रवाल द्वारा जमीन को अपनी बता कर तारबाड़ करने हेतु मजदूर लगाये गये थे।
बताया तो यह भी गया कि हरियाणा का एक बिल्डर अनिल शर्मा जमीन की घेर बाड करवा रहा था, जिसका कथन था कि ये जमीन ऋषिकेश के अशोक अग्रवाल की है और इसकी रजिस्ट्री 30 साल पहले ही हो चुकी है। तथा उसने ये जमीन ऋषिकेश के अशोक अग्रवाल से लीज पर ली है ।

बीते दिनों एक महिला द्वारा उक्त मामले को सोशलमीडिया पर उठाया गया जिसके बाद आज देहरादून के पर्यावरण प्रेमियों में खाशा आक्रोश देखने को मिला ।आज दिनांक 15जून 2025 को पर्यावरण प्रेमी,पत्रकार बन्धु, देहरादून की जागरूक जनता, उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के कई लोग यहाँ पहुंचे ।

साथ ही वन विभाग के डीएफओ और उनकी पूरी टीम मौके पर मौजूद रही ।स्थानीय डीएफओ से बात करने पर “उन्होंने बताया कि यहां एक निजी RF यानी रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र है जो कि तीन लोगों के नाम पर रजिस्टर्ड है ।
उस भूमि पर उन्होंने पाया कि कुछ पेड़ों का कटान हुआ है और जमीन संबंधी मार्किंग के लिए उन्होंने रिवेन्यू विभाग से बात की है जिसकी रिपोर्ट राजस्व विभाग के अधिकारी आज शाम तक देंगे ।उसी के आधार पर तय होगा कि कितनी जमीन उनके क्षेत्र में है,या अवैध कब्जा किया जा रहा है ।
मौके पर मौजूद लोगों व वन विभाग की टीम ने लोहे का गेट, खम्बे और ताड़बाड़ को ध्वस्त किया ।व अनुमति ना होने के कारण मौके पर मौजूद हथियारों को जब्त कर दिया गया ।

परन्तु चौकाने वाली बात यह है कि ” मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण ” की सोशलमीडिया पोस्ट कहती है कि उन्होंने मौके का सर्वेक्षण किया व वहां किसी प्रकार का निर्माण प्रकाश में नहीं आया।
जिस पोस्ट पर जनता द्वारा खूब मजाकिया अंदाज में MDDA पर रिश्वतखोरी का इल्जाम लगा कर निर्माण के सबूत भी रखें गये ।
बताते चले कि इस जमीन पर वर्ष 2000 में भी घेर बाड का कार्य हुआ था, तब भी इसका बेहद विरोध हुआ था । स्थानीय जनता की माने तो इस जमीन के भीतर रिज़र्व वन के मुनारे या सीमा के पिलर आज भी लगे हुए है।
सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण का एक मामला इसके साथ ही लगे वैदिक आश्रम में भी देखने को मिला , जहाँ पहले से ही वैदिक आश्रम की पक्की बाउंड्री बनी हुई है परन्तु जंगलात की जमीन में बोरवेल खोदा गया है साथ ही चौकीदार का रूम भी रिज़र्व फॉरेस्ट में ही बनाया गया है ।सवाल ये उठता है कि जहां वन विभाग नियमित गश्त की बात करता है वहाँ क्या इस प्रकार के अवैध निर्माणों पर विभाग की कोई नजर क्यों नहीं ? या फिर ये सब मिलीभगत से संभव हो रहा है ?


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