Site icon My Uttarakhand News
Subscribe for notification

उत्तराखंड राजधानी में दीपावली से पहले भी सड़कों पर गड्ढे, सरकारी दावों की खुल रही पोल | HNN 24×7

उत्तराखंड राजधानी में सड़कों पर गड्ढे
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दिशानिर्देशों के बाद लोक निर्माण विभाग ने दावा किया था कि दीपावली तक उत्तराखंड की राजधानी की 95 प्रतिशत शहरी सड़कें गड्ढामुक्त हो जाएंगी, लेकिन हकीकत अब भी सरकारी आंकड़ों से अलग है। शहर के कई मार्गों पर पुराने गड्ढे अब भी जिंदा हैं और मरम्मत अधूरी है, जिससे जनता को रोजाना परेशानी उठानी पड़ रही है। विभाग के मुताबिक कागजों में सड़कें दुरुस्त हो चुकी हैं, मगर धरातल पर वास्तविक स्थिति अलग है—छोटे गड्ढों की अनदेखी के कारण वे अब बड़े, गहरे गड्ढों में बदल गए हैं। ऐसे में दीपावली के मौके पर राजधानी में सड़कों की हालत सुधारने के दावे सिर्फ फाइलों में ही चमक रहे हैं।

 
उत्तराखंड में मरम्मत के दावों के बावजूद जनता परेशान
मसूरी के मोतीलाल नेहरू मार्ग, सीजेएम वेवरली चौक, लाइब्रेरी चौक से जीरो प्वाइंट कैंप्टी रोड तक, रुड़की की डीएवी कॉलेज रोड, ऋषिकेश के श्यामपुर, लक्कड़घाट और खदरी रोड समेत कई प्रमुख मार्गों पर आधे फीट तक गहरे गड्ढे वाहन चालकों और आम लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं। हरिद्वार के लक्सर, खानपुर, बहादराबाद ब्लॉक की सड़कें जगह-जगह क्षतिग्रस्त हैं, वहीं धनोरी मार्ग, लक्सर-पुरकाजी मार्ग, बेगमपुर औद्योगिक क्षेत्र और मंगोलपुरा दिल्ली फार्म की सड़कें टूटी हालत में हैं। देहरादून के गांधी रोड, इंदर रोड और देहराखास इलाके भी गड्ढों से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क निर्माण में विभाग केवल ऊपर बिटुमिन की परत डालकर समस्या का समाधान करता है, जबकि नीचे की कमजोर सब-बेस जस की तस ही रहती है, जिससे बारिश या नमी के बाद यही सतह फिर धंस जाती है और गड्ढे दोबारा उभर आते हैं।

 
सवालों के घेरे में सड़क निर्माण वाली कंपनियां
उत्तराखंड में करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाली सड़कें कुछ ही महीनों में टूटने लगती हैं, जिससे जनता की परेशानियां लगातार बढ़ रही हैं। नियम के अनुसार, सड़क निर्माण कंपनियों पर एक से तीन वर्ष का डिफेक्ट लाइबिलिटी पीरियड (गुणवत्ता जिम्मेदारी अवधि) लागू होता है, जिसमें अगर तय समय के भीतर सड़क में कोई दोष निकलता है तो कंपनी को मरम्मत करनी होती है। हालांकि, राज्य में इस नियम का पालन बेहद कमजोर है—हर साल गड्ढे भरने के बावजूद सड़कें बार-बार खराब हो जाती हैं और कंपनियों की जवाबदेही तय नहीं हो पाती।

लेखक- शुभम तिवारी (HNN24X7)

Exit mobile version