नई दिल्ली; उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के अंदर सियासी खींचतान तेज हो गई है. पूर्व मुख्यमंत्री और 78 वर्षीय वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत अपनी ही पार्टी से दो-दो हाथ करने के मूड में नजर आ रहे हैं, जिसके चलते उत्तराखंड से दिल्ली तक सियासी हलचल बढ़ गई है. कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रमों और प्रदेश संगठन को दरकिनार कर रावत द्वारा अकेले यात्राएं निकालने की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या वे पार्टी से बागी हो रहे हैं?
हरीश रावत इन दिनों उत्तराखंड में ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ पर निकले हैं, जिस पर कांग्रेस नेतृत्व ने आपत्ति जताई है. उत्तराखंड की कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा ने हरीश रावत को बाकायदा पत्र लिखकर यात्रा और उनके अन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ाने के लिए कहा था। इसके बावजूद हरीश रावत अपनी यात्रा जारी रखे हुए हैं.
कांग्रेस नेतृत्व चाहता है कि हरीश रावत राज्य में अपने स्तर पर कार्यक्रम करने के बजाय संगठन के साथ मिलकर काम करें. रावत को साफ तौर पर अपनी व्यक्तिगत सियासी गतिविधियों पर लगाम लगाने और पार्टी की लाइन के मुताबिक चलने को कहा गया है, लेकिन हरीश रावत अपने कदम रोकने को तैयार नहीं दिखते. ऐसे में सवाल उठता है कि 78 साल के हरीश रावत क्यों इस राह पर चल रहे हैं और यात्रा के जरिए क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तराखंड की सियासत में हरीश रावत का अपना मजबूत सियासी वजूद है. वे जमीन से जुड़े नेता हैं और अपने संघर्ष के दम पर कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभा चुके हैं. लगभग दो महीने के इलाज और स्वास्थ्य लाभ के बाद देहरादून लौटने के साथ ही वे फिर से राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं.
हरीश रावत इन दिनों उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ निकाल रहे हैं. इस यात्रा की शुरुआत उन्होंने हरिद्वार से की थी. यात्रा के बहाने वे जनता के बीच जाकर सीधे संवाद कर रहे हैं. रावत की इस सक्रियता से समर्थकों और कार्यकर्ताओं की भागीदारी तो दिख रही है, लेकिन प्रदेश संगठन के साथ तालमेल न होने पर पार्टी के भीतर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
कांग्रेस हाईकमान के संदेश के बावजूद रावत पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. नोटिस और नाराजगी की खबरों के बीच वे कुमाऊं के हल्द्वानी, रामनगर, जसपुर और काशीपुर जैसे क्षेत्रों में कार्यक्रम कर रहे हैं, जिसे उनके आक्रामक रुख के तौर पर देखा जा रहा है.
हाईकमान के फरमान का असर क्यों नहीं?उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा ने हरीश रावत को पत्र भेजकर आपत्ति दर्ज कराई थी, जिसकी जानकारी संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को भी दी गई. पत्र में लिखा गया कि राज्य में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में पार्टी को एकजुटता दिखानी होगी, बिना प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी से चर्चा किए समानांतर यात्रा निकालना पार्टी के हित में नहीं है.
इससे पहले केसी वेणुगोपाल ने भी रावत से चर्चा कर संगठन के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी थी. वहीं, हरीश रावत ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी सफाई देते हुए लिखा कि उनकी यात्रा का उद्देश्य जनता का आभार व्यक्त करना है. उन्होंने लिखा, “चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के मान-सम्मान की रक्षा का संकल्प भी उतना ही मजबूत है. इस यात्रा के चरण में अब रुकना नहीं है.” नेतृत्व की हिदायतों के बावजूद वे अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों को आगे बढ़ा रहे हैं.
क्या हरीश रावत सच में बागी हो रहे हैं?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 78 साल की उम्र में हरीश रावत का कांग्रेस छोड़कर किसी अन्य दल में जाना या नई पार्टी बनाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है. वे दशकों से उत्तराखंड कांग्रेस का मुख्य चेहरा रहे हैं. उनकी इस सक्रियता को ‘बगावत’ के बजाय पार्टी के भीतर अपनी प्रासंगिकता और दबदबा बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. वे पार्टी छोड़ने के मूड में नहीं हैं, बल्कि पार्टी में रहते हुए ही अपनी शर्तों पर राजनीति करना चाहते हैं.
उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति को समझने वालों का मानना है कि पार्टी के लिए रावत को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा. राज्य में कई ऐसे नेता हैं जो उनके गुट से जुड़े हैं या उनके नेतृत्व में उभरे हैं. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि वह एक तरफ संगठन में अनुशासन बनाए रखे और दूसरी तरफ रावत जैसे बड़े नेता को भी पूरी तरह नाराज न करे.
अकेले यात्रा निकालने का मकसद क्या है?
उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी से जूझ रही है. पार्टी के भीतर हरीश रावत गुट, प्रीतम सिंह, यशपाल आर्य और करण माहरा जैसे अलग-अलग धड़े सक्रिय माने जाते हैं. जब रावत को लगा कि संगठन के नए समीकरणों में उन्हें दरकिनार करने की कोशिश हो रही है, तो उन्होंने जनता के बीच जाकर यह संदेश देने का रास्ता चुना कि राज्य में जनसमर्थन जुटाने के मामले में वे अब भी सबसे प्रभावी चेहरा हैं.
चुनावी रणनीतियों और फैसलों को ध्यान में रखते हुए हरीश रावत हाईकमान के सामने अपनी ‘बार्गेनिंग पावर’ मजबूत रखना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि टिकट बंटवारे और प्रमुख सांगठनिक फैसलों में उनके समर्थकों को तवज्जो मिले.
रावत ने कांग्रेस को कशमकश में डाला
हरीश रावत की इस ‘एकला चलो’ की रणनीति से प्रदेश संगठन असहज है. प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी का मानना है कि अलग से निकाली जा रही यात्राओं से जनता के बीच गुटबाजी का गलत संदेश जाता है. इसी वजह से केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा.
कुल मिलाकर, हरीश रावत का अकेले यात्रा निकालना कांग्रेस से अलग होने का कदम नहीं है. यह पार्टी के भीतर अपनी घटती भूमिका को रोकने और अपनी राजनीतिक ताकत साबित करने का एक पुराना व परखा हुआ दांव है. वे यह साफ करना चाहते हैं कि भले ही वे 78 साल के हो चुके हों, लेकिन राज्य में कांग्रेस की राजनीति में उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल होगा.
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