देहरादून: उत्तराखंड में पंचायत चुनाव तो जुलाई में हो चुके हैं, लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी राज्य की हजारों ग्राम पंचायतें अब तक गठित नहीं हो पाई हैं. इस देरी की वजह है, पंचायत सदस्यों के 33 हजार पदों का रिक्त होना. स्थिति इतनी गंभीर है कि यह एक तरह का संवैधानिक संकट बन गया है. इससे निपटने के लिए सरकार ने नवंबर में उपचुनाव कराने की तैयारी की है.
5 हजार पंचायतों में प्रधान नहीं ले पाए शपथराज्य की 7,499 ग्राम पंचायतों के लिए जुलाई में चुनाव हुए थे, लेकिन अब तक लगभग 5,000 पंचायतों में प्रधानों की शपथ नहीं हो पाई है. कारण यह है कि शपथ के लिए प्रधान को ग्राम पंचायत सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है. लेकिन इन पंचायतों में तो सदस्य चुने ही नहीं गए! राज्य में 33,000 पंचायत सदस्य पद खाली पड़े हैं, जिन पर किसी उम्मीदवार ने नामांकन तक नहीं किया. नतीजा यह है कि पंचायतों का कामकाज पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है.
संवैधानिक संकट गहरायाचुनाव तो हो गए, लेकिन पंचायतों का गठन न होने से यह स्थिति संवैधानिक संकट का रूप ले चुकी है. जब तक पंचायत सदस्य चुनकर नहीं आते, तब तक ग्राम पंचायत का गठन नहीं हो सकता और बिना पंचायत गठन के गांवों के विकास कार्यों पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता. हालांकि, पंचायती राज विभाग का कहना है कि नवंबर में हर हाल में खाली सीटों पर उपचुनाव करा दिए जाएंगे.
20 पंचायतों में प्रधान का चुनाव भी बाकीखास बात यह है कि लगभग 20 ग्राम पंचायतों में ग्राम प्रधान पद पर भी कोई उम्मीदवार सामने नहीं आया था. जुलाई में हुए चुनाव में यहां न तो प्रधान के लिए, न ही सदस्यों के लिए किसी ने नामांकन किया. अब देखना यह है कि नवंबर में होने वाले उपचुनाव इस संवैधानिक खालीपन को कितनी हद तक भर पाते हैं.
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