देहरादून के प्रेमनगर क्षेत्र में दो साल पहले हुए हिट एंड रन हादसे ने एक मां के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। लेकिन ललिता चौधरी ने हार नहीं मानी। जब पुलिस ने केस बंद कर दिया तो उन्होंने खुद सड़क पर उतरकर जांच शुरू की। सीसीटीवी फुटेज खंगाले, आरटीओ दफ्तर के चक्कर लगाए और सड़क नाप-नापकर सबूत जुटाए। आखिरकार उन्होंने उस ट्रक का नंबर UK07CB6929 ढूंढ निकाला जिसने उनके बेटे क्षितिज की जान ली थी। अब मामले में पुलिस दोबारा जांच करेगी। यह कहानी सिर्फ एक मां के प्यार और न्याय की लड़ाई की नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही के खिलाफ आम नागरिक की जीत की भी है।
हादसे की भयानक रात: 45 मिनट तक सड़क पर तड़पा बेटा
16 फरवरी 2024 को प्रेमनगर इलाके में तेज रफ्तार अज्ञात वाहन ने क्षितिज चौधरी को टक्कर मार दी। युवक घायल हालत में करीब 45 मिनट तक सड़क पर पड़ा तड़पता रहा। किसी ने तुरंत मदद नहीं की। बाद में एंबुलेंस आई और अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों को एक पैर काटना पड़ा, लेकिन 17 फरवरी को क्षितिज की मौत हो गई। ललिता चौधरी ने बताया कि हादसे के बाद चालक फरार हो गया और पुलिस ने भी तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की। रिपोर्ट लिखने में ही टालमटोल शुरू हो गया।यह घटना उत्तराखंड में बढ़ते हिट एंड रन मामलों की एक कड़ी है। आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 2025 में 1846 रोड एक्सीडेंट हुए जिनमें 1242 मौतें दर्ज की गईं। ऐसे मामलों में अक्सर चालक फरार हो जाते हैं और सबूत गायब कर दिए जाते हैं।
पुलिस बोली-मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं…
21 फरवरी को जब महिला ने संबंधित विवेचक से बात की तो जवाब मिला कि बिना नंबर के वाहन खोजना उनके बस की बात नहीं है और उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। अंतत पुलिस ने बिना डंपर चालक को खोजे मामले में एफआर दाखिल कर दी। अब दोबारा जांच से न्याय की उम्मीद जगी है।
पुलिस की लापरवाही ने बढ़ाई पीड़ा, केस बंद कर दिया गया
परिवार का आरोप है कि शुरुआत से ही पुलिस ने गंभीरता नहीं दिखाई। एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई और जांच में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। अंत में पुलिस ने एफआर (फाइनल रिपोर्ट) लगाकर केस बंद कर दिया। ललिता चौधरी कहती हैं, “अगर पुलिस ने समय रहते काम किया होता तो आज आरोपी जेल में होता।” इस लापरवाही ने मां को और ज्यादा आहत किया। बेटे की मौत के घाव पर पुलिस की उदासीनता ने नमक छिड़क दिया।
ललिता चौधरी का 2 साल लंबा संघर्ष: सीसीटीवी से आरटीओ तक की दौड़
पुलिस से उम्मीद टूटने के बाद ललिता चौधरी ने खुद न्याय की लड़ाई लड़ी। दो साल तक उन्होंने आसपास के सभी सीसीटीवी कैमरों के फुटेज जुटाए। हर फुटेज को बार-बार देखा, वाहनों की पहचान की। इसके बाद आरटीओ दफ्तर पहुंचकर दर्जनों ट्रकों के नंबर हासिल किए। उन्होंने हादसे वाली सड़क को बार-बार नापा, कोण मापे और संभावित वाहनों का मिलान किया। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि एक आम मां का सच्चा संघर्ष था।
उनकी मेहनत रंग लाई। जांच में सामने आया कि हादसे में शामिल ट्रक का नंबर UK07CB6929 है। यह ट्रक अंकित चौहान के नाम पर रजिस्टर्ड बताया जा रहा है। ललिता चौधरी ने कहा, “मैंने हर दिन सड़क पर खड़ी होकर सोचा कि मेरा बेटा यहीं तड़पा था। मैंने हार नहीं मानी।”
ट्रक UK07CB6929 का खुलासा: अब शुरू होगी अग्रिम विवेचना
मां के सबूतों के आधार पर अब मामले में नई उम्मीद जगी है। ललिता चौधरी एसएसपी से मिलीं और पूरे मामले की दोबारा जांच की मांग की। एसएसपी ने आश्वासन दिया। इसके बाद प्रेमनगर थाने में प्रार्थनापत्र दिया गया। प्रेमनगर थाना प्रभारी नरेश राठौर ने बताया कि पहले एफआर लग चुकी थी, लेकिन नए सबूत मिलने पर अग्रिम विवेचना शुरू की जाएगी।
कानूनी रूप से यह पूरी तरह सही प्रक्रिया है। एफआर के बाद भी अगर कोई महत्वपूर्ण सबूत या पहलू छूट गया हो तो पुलिस सच्चाई तक पहुंचने के लिए आगे जांच कर सकती है। यह प्रक्रिया लंबित मामलों में न्याय सुनिश्चित करती है।
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