अपना राज्य जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक धरोहर, और आध्यात्मिक महत्त्व के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन यह राज्य पलायन जैसे गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। गांवों से हो रहे इस बड़े पैमाने पर पलायन ने राज्य के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित किया है। एक तरफ जहां नई तकनीक और नई संसाधनों का विकास हो रहा है तो वहीं सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में हालत ठीक उलट नजर आ रहे हैं. पहाड़ों में लोग लगातार खेती से मुंह मोड़ रहे हैं।
खेती बाड़ी न होने की वजह से हर साल कई हेक्टेयर जमीन बंजर हो रही है. जहां पहले गांवों में खेत ही खेत नजर आते थे, वहां अब झाडियां और जंगल नजर आ रहे हैं. उत्तराखंड के पहाड़ी गांव, जो कभी हरियाली और समृद्धि का प्रतीक थे, आज पलायन की समस्या से जूझ रहे हैं। रोजगार की तलाश में युवाओं द्वारा शहरों की ओर रुख करने से गांवों में बंजर खेत और सूनी गलियां ही बची रह गई हैं। पलायन ने न केवल गांवों की आबादी को कम किया है, बल्कि खेत-खलिहान भी वीरान हो गए।
• पलायन के कारण उत्तराखंड के कई गांव पूरी तरह खाली हो गए हैं। इन “घोस्ट विलेज” में अब केवल पुराने मकानों के खंडहर और घास-फूस ही बचा है। यह समस्या न केवल सामाजिक बल्कि सांस्कृतिक संकट को भी जन्म दे रही है।
• गांवों के खाली होने से लोक संस्कृति, परंपराएं, और रीति-रिवाज धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं। पर्वतीय संगीत, नृत्य, और कुमाऊंनी-गढ़वाली भाषा का संरक्षण कठिन होता जा रहा है।
• पलायन से आर्थिक असमानता भी बढ़ रही है। जो लोग शहरों में चले जाते हैं, वे बेहतर आय अर्जित करते हैं, जबकि गांव में रहने वाले लोग पिछड़ते जाते हैं।
• गांव खाली होने से जंगलों का विस्तार हो रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा है। इसके अलावा, कृषि भूमि के परित्याग से मिट्टी की गुणवत्ता भी खराब हो रही है।
इन सब समस्यों को ध्यान में रखते हुए कई ग्रामसभों की तरह उत्तराखंड के नरेंद्र नगर ब्लॉक के ग्राम सभा बुगाल की ग्रामीण महिलाओं ने पुनरुत्थान रूरल डेवलपमेंट एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी (उत्तराखंड के गाँवों में रिवर्स माइग्रेशन पर कार्य कर रही संस्था है ) व अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर बंजर पड़े खेतों को खेती योग्य बनाने की पहल की । यह एक प्रेरणादायक पहल है जो ग्राम सभा बुगाला की महिलाओं की शक्ति और उनके आत्मनिर्भरता के प्रयासों को दर्शाती है। बंजर पड़े खेतों को खेती योग्य बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसमें सामूहिक प्रयास, मेहनत, और योजनाबद्ध तरीके से काम करना आवश्यक है।
• बंजर भूमि पर विविध प्रकार की फसलों को उगाने का प्रयास किया जाएगा , जैसे कि दलहन, तिलहन, सब्जियां और औषधीय पौधे। इन प्रयासों से न केवल महिलाओं की आय में वृद्धि होगी’, बल्कि उन्होंने आत्मनिर्भरता का अनुभव भी किया।
इस कार्य में ग्राम सभा के बिश्मबरी रयाल, सरोजनी रयाल, सरस्वती रयाल, प्रभा रयाल, शकुंतला रयाल, दर्शनी रयाल, सुनीता रयाल, मीना रयाल, विमला देवी, रजनी रयाल, अनीता रयाल, सरोजनी देवी, बंशीधर रयाल, नरेश रयाल, गुरुप्रसाद रयाल, त्रिलोकी नाथ रयाल, गोविंदराम रयाल, चिरंजीलाल रयाल, व सामाजिक कार्यकर्ता संजय दत्त रयाल ।
परिणाम:बंजर खेतों में हरियाली लौटी । महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिले । सामुदायिक विकास और महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ। पुनरुत्थान संस्था और ग्रामीण महिलाओं का यह प्रयास अन्य समुदायों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है।
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