राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान, त्रिपुरा छात्र एंजेल चकमा हत्याकांड पर उत्तराखंड सरकार को जारी किया नोटिस – पर्वतजन

देहरादून में त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र **एंजेल चकमा** की क्रूर हत्या का मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से उठ रहा है। यह घटना 9 दिसंबर 2025 को सेलाकुई बाजार में हुई, जहां एंजेल अपने छोटे भाई के साथ थे। नशे में धुत कुछ युवकों ने उन पर नस्लीय टिप्पणियां कीं, जिसका विरोध करने पर हमलावरों ने चाकू और अन्य हथियारों से उन पर जानलेवा हमला कर दिया। छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए और अस्पताल में 16-17 दिनों तक इलाज के बाद 25 या 26 दिसंबर को उनकी मृत्यु हो गई।
 
एंजेल चकमा उनाकोटी जिले के निवासी थे और देहरादून की एक निजी विश्वविद्यालय में एमबीए की अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। उनके पिता तरुण प्रसाद चकमा बीएसएफ में तैनात हैं। परिवार का आरोप है कि हमले के दौरान एंजेल ने बार-बार कहा था कि “मैं भी भारतीय हूं, चाइनीज नहीं”, लेकिन फिर भी हमलावरों ने हिंसा नहीं रोकी।

 
इस घटना के बाद त्रिपुरा में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जहां लोगों ने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। अगरतला में मोमबत्ती जुलूस और प्रदर्शन हुए, जिससे मामला पूर्वोत्तर राज्यों में काफी गूंजा।
 
देहरादून पुलिस ने अब तक छह आरोपियों में से पांच को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि एक मुख्य आरोपी फरार है (जिसकी तलाश नेपाल तक जारी है और उस पर इनाम घोषित किया गया है)। पुलिस ने प्रारंभिक जांच में नस्लीय टिप्पणियों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलने की बात कही है और मामले को सामान्य विवाद बताते हुए हत्या की धारा जोड़ी है।
 
हालांकि, इस प्रकरण ने अब **राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी)** का ध्यान खींच लिया है। आयोग के सदस्य **प्रियंक कानूनगो** की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने देहरादून के जिलाधिकारी (डीएम) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) से अब तक की जांच और कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट सात दिनों के अंदर मांगी है।
 
इसके अलावा, एनएचआरसी ने उत्तराखंड के **मुख्य सचिव** और **डीजीपी** को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पूरे राज्य में पूर्वोत्तर राज्यों के छात्रों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। आयोग ने कहा है कि ऐसी घटनाएं मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हैं और भविष्य में ऐसी वारदातों को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
 
यह मामला न केवल एक हत्याकांड है, बल्कि पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होने वाले संभावित भेदभाव पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। जांच आगे बढ़ने के साथ-साथ न्याय की उम्मीद बढ़ रही है।

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