पेट्रोल-डीजल महंगा: निजी कंपनी का बड़ा झटका, सरकारी दाम स्थिर – my uttarakhand news

 
देहरादून,  देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। निजी तेल कंपनी नायरा एनर्जी ने पेट्रोल के दाम में 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। वहीं, सरकारी तेल कंपनियों ने अभी तक अपने दामों में कोई बदलाव नहीं किया है।
इस फैसले के बाद आम उपभोक्ताओं के बीच यह सवाल उठने लगा है कि आखिर निजी और सरकारी कंपनियों के दामों में अंतर क्यों देखने को मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें भले ही डीरेगुलेटेड मानी जाती हैं, लेकिन व्यवहार में सरकारी कंपनियां महंगाई को नियंत्रित करने के लिए कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद कीमतों को स्थिर बनाए रखती हैं।
सरकारी कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को इस दौरान होने वाले घाटे की भरपाई सरकार द्वारा की जाती है। इसके विपरीत, निजी कंपनियों को किसी प्रकार की सब्सिडी या वित्तीय सहायता नहीं मिलती, जिससे उन्हें लागत बढ़ने पर कीमतों में वृद्धि करनी पड़ती है।
इंपोर्ट पैरिटी प्राइस (IPP) का असर
निजी कंपनियां अपने उत्पादों की कीमत ‘इंपोर्ट पैरिटी प्राइस’ (IPP) के आधार पर तय करती हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का मूल्य, समुद्री भाड़ा, बीमा और पोर्ट शुल्क शामिल होता है। वैश्विक बाजार से सीधा जुड़ाव होने के कारण उनकी लागत अधिक संवेदनशील रहती है।
टैक्स और बेस प्राइस का गणित
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारों का वैट (VAT) समान रूप से लागू होता है। हालांकि, निजी कंपनियों की बेस कॉस्ट अधिक होने और डीलरों को प्रतिस्पर्धी कमीशन देने के कारण अंतिम कीमत बढ़ जाती है।
अंडर-रिकवरी और बाजार की चुनौती
जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं और सरकारी कंपनियां दाम नहीं बढ़ातीं, तो ‘अंडर-रिकवरी’ की स्थिति बनती है। ऐसे में निजी कंपनियों के लिए उसी कीमत पर ईंधन बेचना संभव नहीं होता, जिससे वे दाम बढ़ाने का निर्णय लेती हैं।
देश में रिलायंस (Jio-bp), नायरा एनर्जी और शेल जैसी निजी कंपनियां पेट्रोल-डीजल का वितरण करती हैं। इन कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिना सरकारी संरक्षण के प्रतिस्पर्धा बनाए रखना है।
ऐसे में उपभोक्ताओं को अलग-अलग पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग कीमतें देखने को मिलती हैं, जिसके पीछे लागत, टैक्स ढांचा और नीतिगत अंतर मुख्य कारण हैं।

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