देहरादून: उत्तराखंड में लंबे इंतजार के बाद हुए कैबिनेट विस्तार ने राज्य की राजनीति में नए समीकरण खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मंत्रिमंडल में अब उन नेताओं का प्रभाव बढ़ गया है, जिनकी राजनीतिक जड़ें कभी कांग्रेस से जुड़ी रही हैं। इस बदलाव ने राज्य की सियासत को एक नया आयाम दिया है, जहां पार्टी बदलकर आए नेताओं की भूमिका अब पहले से अधिक मजबूत होती दिख रही है।
हालिया विस्तार के बाद मंत्रिमंडल में कुल 11 मंत्री शामिल हैं, जिनमें से सात ऐसे हैं जो पहले कांग्रेस या निर्दलीय पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं। पहले से कैबिनेट में मौजूद सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल और रेखा आर्य कांग्रेस से भाजपा में आए प्रमुख चेहरे हैं।
इस बार कैबिनेट में शामिल किए गए नए मंत्रियों में भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा और राम सिंह कैड़ा का राजनीतिक सफर भी कांग्रेस या निर्दलीय पृष्ठभूमि से शुरू हुआ है। वहीं सौरभ बहुगुणा पारिवारिक रूप से कांग्रेस से जुड़े रहे, लेकिन अब भाजपा के अहम चेहरों में शामिल हैं।
इसके विपरीत, मंत्रिमंडल में ऐसे नेता अपेक्षाकृत कम हैं जिन्हें भाजपा की मूल विचारधारा से जुड़ा माना जाता है। इनमें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अलावा मदन कौशिक, धन सिंह रावत और गणेश जोशी प्रमुख हैं।
कैबिनेट में कांग्रेस पृष्ठभूमि के नेताओं को अधिक प्रतिनिधित्व मिलने के सवाल पर भाजपा विधायक विनोद चमोली ने स्पष्ट किया कि अतीत की बजाय वर्तमान महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि ये सभी नेता अब भाजपा के प्रति पूरी निष्ठा से कार्य कर रहे हैं और उन्हें भाजपा कार्यकर्ता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
शुक्रवार को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल गुरमीत सिंह ने लोकभवन में नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस दौरान खजान दास, मदन कौशिक, प्रदीप बत्रा, भरत सिंह चौधरी और राम सिंह कैड़ा ने मंत्री पद की शपथ ली। इनमें मदन कौशिक और खजान दास पहले भी मंत्री रह चुके हैं, जबकि अन्य को पहली बार कैबिनेट में स्थान मिला है।
पांच नए मंत्रियों के शपथ लेने के साथ ही धामी मंत्रिमंडल अब पूर्ण रूप से आकार ले चुका है। छोटे राज्यों के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार उत्तराखंड में मुख्यमंत्री समेत अधिकतम 12 मंत्री हो सकते हैं, और अब सभी पद भर दिए गए हैं।
पिछले एक वर्ष से कैबिनेट विस्तार को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही थीं। वर्ष 2023 में चंदन राम दास के निधन और मार्च 2025 में प्रेमचंद अग्रवाल के इस्तीफे के बाद मंत्रिमंडल में रिक्तियां बढ़ गई थीं। इसके अलावा पहले से ही तीन पद खाली चल रहे थे, जिससे विस्तार की जरूरत और बढ़ गई थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कैबिनेट विस्तार के जरिए क्षेत्रीय, सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की गई है। साथ ही, पार्टी बदलकर आए नेताओं को अहम जिम्मेदारी देकर भाजपा ने यह संदेश भी दिया है कि संगठन में सभी को अवसर मिल सकता है।
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