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ऋषभ पंत के जमीन वाले ट्वीट पर सियासत, 3 साल बाद सोशल मीडिया का सहारा क्यों? – myuttarakhandnews.com

भारतीय क्रिकेटर ऋषभ पंत ने एक्स पोस्ट पर उत्तराखंड में जमीन खरीदकर अपना घर बनाने की इच्छा जाहिर की है, ऋषभ पंत ने इस पोस्ट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को को Tag किया है. वहीं, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से नियमों के तहत मदद का भरोसा मिलने के बाद यह मामला उत्तराखंड की जमीन नीति, प्रशासनिक प्रक्रिया और सिस्टम तक पहुंच को लेकर बहस का विषय बन गया है.
वहीं ऋषभ पंत ने कहा है कि वह जमीन मुफ्त में नहीं लेना चाहते, बल्कि खरीदना चाहते हैं और करीब तीन साल से उपयुक्त जमीन की तलाश कर रहे हैं. सवाल अब यह है कि अगर जमीन खरीदने की इच्छा निजी है और खरीद-बिक्री जमीन मालिक और खरीदार के बीच होनी है, तो आखिर पंत को मुख्यमंत्री को सार्वजनिक तौर पर टैग करके मदद क्यों मांगनी पड़ी?
तीन साल की तलाश, लेकिन अड़चन आखिर कहां थी?पंत की सार्वजनिक अपील से सबसे बड़ा सवाल यही निकलता है कि तीन साल तक चली जमीन की तलाश में बाधा किस स्तर पर आई. क्या उन्हें पसंद की जमीन नहीं मिली? क्या जमीन की श्रेणी ऐसी थी जिस पर खरीद के लिए कानूनी प्रतिबंध लागू होते हैं? क्या जमीन मालिकों से बातचीत के बावजूद सौदा आगे नहीं बढ़ पाया? या फिर प्रशासनिक मंजूरियों और दस्तावेजों की प्रक्रिया में समस्या आई?
फिलहाल सार्वजनिक रूप से इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है. पंत ने अपनी पोस्ट में अपनी परेशानी जरूर बताई, लेकिन यह विस्तार से नहीं बताया कि तीन साल के दौरान उन्होंने किन विभागों या अधिकारियों के सामने यह मामला उठाया और वहां से उन्हें क्या जवाब मिला.
क्या मुख्यमंत्री से पहले मुलाकात हुई थी?इस पूरे मामले का सबसे अहम और अभी अनुत्तरित सवाल यही है कि क्या पंत ने ट्वीट करने से पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से व्यक्तिगत मुलाकात कर अपनी समस्या बताई थी? क्या उन्होंने मुख्य सचिव या संबंधित राजस्व अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी थी? क्या जिलाधिकारी या संबंधित विभाग को जमीन खरीदने में आ रही अड़चन के बारे में कोई औपचारिक जानकारी दी गई थी?
उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में इसका स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आया है. इतना जरूर सामने आया है कि पंत की सोशल मीडिया अपील के बाद मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को उनसे संपर्क करने और नियमों के तहत सहयोग देने की बात कही. इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि पंत ने पहले कभी किसी अधिकारी से संपर्क नहीं किया था, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि यदि सामान्य प्रशासनिक माध्यमों से मामला आगे बढ़ रहा था, तो सार्वजनिक अपील की जरूरत क्यों महसूस हुई.
जमीन खरीदनी है तो सरकार को क्यों टैग किया?पंत ने अपनी पोस्ट में साफ किया है कि वह जमीन खरीदना चाहते हैं, सरकार से मुफ्त में जमीन लेने की मांग नहीं कर रहे. यही बात इस विवाद को और दिलचस्प बनाती है. सामान्य स्थिति में किसी निजी जमीन की खरीद एक खरीदार और जमीन मालिक के बीच का लेन-देन होता है. सरकार की भूमिका यह सुनिश्चित करने की होती है कि जमीन की खरीद मौजूदा कानूनों, भूमि की श्रेणी और निर्धारित प्रक्रियाओं के मुताबिक हो.
ऐसे में अगर पंत को किसी निजी व्यक्ति की जमीन खरीदनी है और वह जमीन कानूनन खरीदी जा सकती है, तो सरकार से मदद की जरूरत आखिर किस स्तर पर पड़ रही है—यह सवाल अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा है. वहीं यदि उनकी पसंद की जमीन ऐसी श्रेणी में आती है जिस पर कानूनन प्रतिबंध है, तो मामला सिर्फ खरीदार-विक्रेता का नहीं रह जाता और सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत स्वाभाविक रूप से पैदा हो सकती है. इसलिए पंत की वास्तविक परेशानी का जवाब तभी मिलेगा जब यह स्पष्ट होगा कि उन्हें किस क्षेत्र में और किस श्रेणी की जमीन चाहिए.
उत्तराखंड के मूल निवासियों और बाहरी खरीदारों का सवाल भी जुड़ाइस बहस में एक और महत्वपूर्ण पहलू है. उत्तराखंड में जमीन खरीद के नियम सभी लोगों के लिए एक जैसे नहीं हैं और पिछले वर्षों में भूमि कानूनों को लेकर काफी सख्ती की गई है. खासकर पर्वतीय जिलों में कृषि और बागवानी भूमि की खरीद को लेकर बाहरी लोगों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, जबकि आवासीय जमीन के संबंध में अलग प्रावधान हैं. ऐसे में केवल यह कहना कि “उत्तराखंड में जमीन खरीदना मुश्किल है”, पूरी तस्वीर नहीं बताता.
असली सवाल यह है कि पंत किस तरह की जमीन चाहते हैं और वह जमीन मौजूदा कानून के तहत किस श्रेणी में आती है. अगर कोई जमीन कानूनी तौर पर बिक्री योग्य है तो उसके मालिक को बेचने और खरीदार को खरीदने की प्रक्रिया में सरकार की भूमिका नियमों के पालन तक सीमित होनी चाहिए. इसलिए सरकार को घसीटे जाने का सवाल तभी पूरी तरह समझ आएगा, जब जमीन की प्रकृति और खरीद में आई वास्तविक बाधा सामने आएगी. ऋषभ पंत तो उत्तराखंड के मूल निवासी है नियमानुसार वह जितनी चाहें ज़मीन उत्तराखंड में ख़रीद सकते हैं
उमेश कुमार ने भी उठाया यही सवालउत्तराखंड में खानपुर से निर्दलीय विधायक और पंत के पारिवारिक मित्र उमेश कुमार ने भी पंत की सार्वजनिक अपील के तरीके पर सवाल उठाया है. उन्होंने पंत को छोटे भाई जैसा बताते हुए हरसंभव सहयोग की बात कही, लेकिन उनका कहना है कि अगर जमीन खरीदने में परेशानी थी तो पंत सीधे मुख्यमंत्री से बात कर सकते थे. उनके बयान का मूल सवाल यही है कि व्यक्तिगत और प्रशासनिक स्तर पर बातचीत का रास्ता पहले क्यों नहीं अपनाया गया.
हालांकि दूसरी तरफ यह तर्क भी सामने आ सकता है कि अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक सामान्य प्रक्रिया से समाधान नहीं मिलता, तो सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाना उसके लिए ज्यादा प्रभावी माध्यम हो सकता है. पंत ने खुद ट्वीट क्यों चुना, इसका अंतिम जवाब फिलहाल उनकी ओर से सामने नहीं आया है.
एक ट्वीट और सिस्टम पर बड़ा सवालपंत के ट्वीट के बाद जिस तेजी से मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया सामने आई, उसने सोशल मीडिया की ताकत को भी उजा
गर किया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार मौजूदा नियमों के तहत सहयोग करेगी और अधिकारी पंत से संपर्क करेंगे. यानी ट्वीट के बाद प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय होने की बात सामने आई.
यहीं से आम आदमी के नजरिए से भी सवाल पैदा होता है—क्या किसी सामान्य नागरिक की शिकायत पर भी इसी तेजी से शीर्ष स्तर से प्रतिक्रिया मिलती है? सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसी आधार पर व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ प्रतिक्रियाओं में यह पूछा गया कि करोड़ों की संपत्ति रखने वाले व्यक्ति को जमीन खरीदने के लिए सरकार की मदद की जरूरत क्यों पड़ रही है. इन सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं को तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन वे यह जरूर दिखाती हैं कि पंत के ट्वीट ने व्यक्तिगत समस्या को सार्वजनिक बहस में बदल दिया है.
कांग्रेस को मिला सरकार घेरने का मौकाकांग्रेस ने भी इस मामले को सरकार की कार्यशैली से जोड़ दिया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने दावा किया कि पंत करीब तीन साल पहले उत्तराखंड में क्रिकेट अकादमी शुरू करने की इच्छा जता चुके थे. कांग्रेस का सवाल है कि अगर ऐसी पहल से राज्य के युवाओं को खेल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर मिल सकते थे तो मामला इतने लंबे समय तक क्यों अटका रहा. इस तरह विपक्ष ने पंत की निजी जमीन की समस्या को खेल नीति, निवेश और सरकारी निर्णय प्रक्रिया के मुद्दे में बदल दिया है. अब सरकार के सामने केवल पंत को जवाब देने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह भी बताना होगा कि उनकी समस्या वास्तव में किस स्तर पर थी और उसे हल करने में पहले क्या प्रयास किए गए.
अब सबसे बड़ा सवाल पंत की जमीन नहीं, प्रक्रिया का हैइस पूरे मामले में अभी तक एक बात स्पष्ट है—पंत जमीन मुफ्त में देने की मांग नहीं कर रहे हैं. वह खरीद की बात कर रहे हैं और मुख्यमंत्री ने भी किसी विशेष जमीन के आवंटन या कानून से बाहर जाकर कोई सुविधा देने की बात नहीं कही है. इसलिए आगे की असली कहानी यही होगी कि अधिकारी पंत से संपर्क करने के बाद उनकी जरूरत और समस्या को किस रूप में समझते हैं. यदि जमीन कानून के दायरे में उपलब्ध है तो क्या सरकार उन्हें केवल सही प्रक्रिया तक पहुंचाएगी? और अगर जमीन की श्रेणी या स्थान कानून के कारण प्रतिबंधित है तो क्या पंत अपनी पसंद बदलेंगे? यही बातें तय करेंगी कि यह मामला कुछ दिनों में खत्म हो जाता है या उत्तराखंड की भूमि नीति पर लंबी बहस छेड़ता है.
दरअसल, पंत का ट्वीट जमीन से ज्यादा एक सिस्टम का सवाल बन गया है. तीन साल की तलाश के बाद सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री को टैग करना यह बताता है कि कहीं न कहीं उन्हें प्रक्रिया में ऐसी अड़चन महसूस हुई जिसे वह सार्वजनिक तौर पर उठाना जरूरी समझ रहे थे.
दूसरी तरफ, अगर जमीन निजी मालिक से खरीदी जानी है और पंत कानूनी रूप से खरीद के पात्र हैं, तो सरकार से मदद मांगने की जरूरत और उस मदद की वास्तविक प्रकृति भी स्पष्ट होनी चाहिए. क्या पहले मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव या संबंधित अधिकारियों से औपचारिक बातचीत हुई थी—इसका जवाब सामने आना इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है. फिलहाल ट्वीट ने सवाल खड़ा कर दिया है; अब जवाब सरकार और पंत, दोनों की अगली कार्रवाई से मिलेगा.

Nandni sharma

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