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ऋषिकेश सब-रजिस्ट्रार सस्पेंड: स्टांप शुल्क घोटाला, फर्जी कार्मिक और लंबित दस्तावेजों पर बड़ा एक्शन
ऋषिकेश में तैनात सब-रजिस्ट्रार हरीश कुमार को करोड़ों रुपये के स्टांप शुल्क नुकसान, अनधिकृत व्यक्ति से कार्यालय कार्य कराने और पंजीकरण प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोपों के बाद निलंबित कर दिया गया है। यह कार्रवाई सचिव वित्त दिलीप जावलकर द्वारा जिलाधिकारी सविन बंसल की संस्तुति पर की गई। शासन ने उनके विरुद्ध विधिवत विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही भी प्रारंभ कर दी है।
28 जनवरी 2026 के औचक निरीक्षण के बाद खुली परतें
28 जनवरी 2026 को हुए आकस्मिक निरीक्षण में पंजीकरण व्यवस्था में कानून उल्लंघन, फर्जी कार्मिक की संलिप्तता, बड़े पैमाने पर स्टांप शुल्क की अपवंचना और नागरिकों के मूल दस्तावेज लंबे समय तक रोके जाने जैसे गंभीर तथ्य सामने आए।
जिलाधिकारी ने उप जिलाधिकारी ऋषिकेश तथा जिला शासकीय अधिवक्ता (राजस्व) की उपस्थिति में कार्यालय का निरीक्षण किया, जिसमें कई चौंकाने वाले बिंदु उजागर हुए।
उप निबंधक की गैरहाजिरी में पंजीकरण
निरीक्षण के दौरान उप निबंधक बिना पूर्व सूचना अनुपस्थित पाए गए। उनकी अनुपस्थिति में निबंधक लिपिक द्वारा विलेखों का पंजीकरण किया जा रहा था, जो निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत है।
‘घोस्ट’ कर्मचारी की मौजूदगी
कार्यालय में जितिन पंवार नामक व्यक्ति कार्य करता पाया गया, जबकि उसके नाम का कोई नियुक्ति पत्र या उपस्थिति पंजिका में रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। प्रारंभिक जांच में उसके रजिस्ट्री कार्यों में शामिल होने की आशंका जताई गई। जिलाधिकारी द्वारा कार्मिकों का संपूर्ण अभिलेख तलब करने पर यह अनियमितता स्पष्ट हुई।
वर्षों तक रोके गए मूल दस्तावेज
निरीक्षण में यह भी सामने आया कि सैकड़ों मूल विलेख और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज महीनों और वर्षों से कार्यालय में लंबित पड़े थे। नियमानुसार पंजीकरण के तीन दिन के भीतर मूल अभिलेख लौटाना अनिवार्य है, किंतु कई मामलों में दस्तावेज लंबे समय तक वापस नहीं किए गए और उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी भी नहीं दी गई।
अर्जेंट नकल में भी भारी देरी
जहां तत्काल नकल 24 घंटे में उपलब्ध कराई जानी चाहिए, वहीं कई आवेदन महीनों और वर्षों तक लंबित पाए गए।
दून घाटी विशेष महायोजना 2031 से जुड़ा बड़ा खुलासा
ग्राम माजरी ग्रांट, तहसील डोईवाला क्षेत्र में दून घाटी विशेष महायोजना 2031 के अंतर्गत औद्योगिक उपयोग हेतु आरक्षित भूमि को आवासीय दर्शाकर छोटे हिस्सों में विभाजित कर पंजीकृत किया गया। इस प्रक्रिया में औद्योगिक दरों के स्थान पर आवासीय दरों पर रजिस्ट्री कराई गई और संपत्ति मूल्यांकन में गंभीर विसंगतियां पाई गईं। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार इससे सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व नुकसान हुआ।
नियमों की अनदेखी
संयुक्त जांच रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि उप निबंधक द्वारा भारतीय स्टांप (उत्तराखंड संशोधन) अधिनियम 2015 की धारा 47-क, भारतीय रजिस्ट्रेशन मैनुअल के नियम 325, 195 और 196 तथा उत्तराखंड शासन की अधिसूचना संख्या 368/28.04.2016 के प्रावधानों का अनुपालन नहीं किया गया। इन प्रावधानों के तहत संपत्ति का सही मूल्य निर्धारण और स्टांप शुल्क वसूली अनिवार्य है।
फरियादियों की शिकायतें भी आईं सामने
निरीक्षण के दौरान मौजूद कई आवेदकों ने मूल दस्तावेज वापस पाने में हो रही देरी और रजिस्ट्री नकल के लिए अनावश्यक प्रतीक्षा की शिकायत की। कुछ मामलों में दस्तावेज न मिलने से बैंक ऋण, नामांतरण और अन्य राजस्व संबंधी कार्य प्रभावित होने की जानकारी भी दी गई।
शासन का त्वरित कदम
जिला प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर शासन ने त्वरित निर्णय लेते हुए सब-रजिस्ट्रार को निलंबित किया और उन्हें मुख्यालय से संबद्ध किया। साथ ही विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि राजस्व हितों से समझौता करने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाएगा।
अन्य कार्यालय भी जांच के दायरे में
जिला प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि यह कार्रवाई एक उदाहरण है और भविष्य में अन्य सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों में भी औचक निरीक्षण किए जाएंगे, ताकि पंजीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।