देहरादून, 16 जनवरी 2026: प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश महेश चंद्र कौशिक की पीठ ने एक स्कूल स्टाफ सदस्य को नाबालिग छात्र के साथ दुराचार के आरोप में दोषी करार देते हुए सात वर्ष की कड़ी कैद और 15,000 रुपये के अर्थदंड की सजा दी है। पहले इस व्यक्ति को वर्ष 2023 में दो वर्ष की कैद सुनाई गई थी, जिसके विरुद्ध उसने उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी। अभियोजन पक्ष की ओर से सजा को उम्रकैद में परिवर्तित करने की अपील को न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।
दिल्ली के एक निवासी ने 11 नवंबर 2011 को स्थानीय थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उनका 13 साल का पुत्र देहरादून स्थित एक आवासीय विद्यालय में सातवीं कक्षा का छात्र था। दिवाली की छुट्टियों के दौरान 15 अक्टूबर 2011 को वह अपने मामा के साथ दिल्ली पहुंचा और 11 नवंबर को मामा उसे वापस स्कूल छोड़कर लौट गए। बाद में एक परिचित ने फोन करके सूचित किया कि बच्चा विद्यालय से फरार हो गया है और एक स्टाफ सदस्य ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया है।
परिवार द्वारा पूछताछ करने पर बच्चे ने खुलासा किया कि आरोपी ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। इस आधार पर थाना पुलिस ने आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की और 13 नवंबर 2011 को उसे हिरासत में लिया। चार माह तक हिरासत में रहने के बाद मार्च 2012 में आरोपी को जमानत पर मुक्त कर दिया गया। मामले की सुनवाई 11 वर्ष तक चली, जिसके बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम उर्वशी रावत की अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए दो वर्ष की कैद और 10,000 रुपये के जुर्माने का फैसला सुनाया था।
सहायक जिला लोक अभियोजक अरविंद कपिल ने जानकारी दी कि दोषी ने 25 सितंबर 2023 को अपील की, जिसे न्यायालय ने निरस्त करते हुए सजा को बढ़ाकर सात वर्ष कर दिया और अर्थदंड को 15,000 रुपये कर दिया। अर्थदंड का भुगतान न करने की स्थिति में दोषी को तीन माह की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी। न्यायालय ने दोषी को 29 जनवरी को हाजिर होने के आदेश जारी किए हैं।
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