हरिद्वार, । हरिद्वार में प्रवाहित रामकथा के आठवें दिन मोरारी बापू ने कहा कि सुंदरकांड का मूल संदेश मैत्री, ज्ञान और स्वयंप्रभा है। कथा के दौरान उन्होंने जीवन में संतोष, क्षमा, दया और विनम्रता को अमृत की ओर ले जाने वाले गुण बताते हुए कहा कि निंदा, क्रोध, झूठ और ईर्ष्या मनुष्य को भीतर से कमजोर बनाते हैं। उन्होंने कहा कि “महापुरुषों के आशीर्वाद के कूप में डूबे रहे तो वजन नहीं लगता। यहां सभी लोगों का मत एक नहीं होता, लेकिन सत एक होता है।”
आठवें दिन व्यासपीठ पर तीन विशेष आयोजन हुए। सबसे पहले व्यासपीठ एक वैदिक विवाह की साक्षी बनी, जहां मनोरथी परिवार के समीरभाई और विनाबहन की पुत्री वृक्षा तथा जगदीशभाई और गीताबहन के पुत्र प्रेम का वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह संपन्न हुआ। भद्रायुभाई वच्छराजानी ने मंगलाष्टक का गायन किया और मोरारी बापू ने नवदंपति को आशीर्वाद प्रदान किया। इसके साथ ही नेपाल के काठमांडू स्थित तपोवन आश्रम से आए ओशो संन्यासी स्वामी आनंद अरुण ने अपनी पुस्तक का व्यासपीठ पर लोकार्पण कराया। उन्होंने मोरारी बापू के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि मोरारी बापू ने देश-विदेश में रामकथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति का प्रचार किया है। वहीं भद्रायुभाई द्वारा तैयार एक विशेष पुस्तिका भी संतों के करकमलों से व्यासपीठ को समर्पित की गई।
कथा में मोरारी बापू ने कहा कि जीवन में सबसे बड़े शत्रु बाहरी नहीं, बल्कि भीतर के विकार हैं। उन्होंने रावण के चार प्रतीकात्मक सहयोगियों—दुर्मुख, सूररिपु, अतिकाय और महोदर—की व्याख्या करते हुए कहा कि दुर्मुख वह है जो हर समय शिकायत, निंदा, क्रोध, झूठ या दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या में जीता है। सूररिपु दैवी गुणों का विरोधी है, अतिकाय अस्थिर मन का प्रतीक है और महोदर अतृप्त लोभ का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इन आंतरिक शत्रुओं पर विजय स्वाध्याय, संयम, यज्ञ और संतोष के माध्यम से ही संभव है।
मोरारी बापू ने आदि शंकराचार्य की विवेकचूड़ामणि का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि मोक्ष की इच्छा है तो विषय-वासनाओं को विष के समान त्यागकर संतोष, दया, क्षमा, आर्जव (विनम्रता), प्रशांति और संयम को अमृत की तरह अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यही छह गुण मनुष्य को अमृत की ओर ले जाते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि राम मंदिर निर्माण के लिए आयोजित पिठोरिया हनुमान कथा के दौरान व्यासपीठ की ओर से 19 करोड़ रुपये का योगदान दिया गया था।
कथा के समापन में मोरारी बापू ने अरण्यकांड के बाद सुंदरकांड का संक्षिप्त भावार्थ प्रस्तुत करते हुए कहा कि इसका सार मैत्री, ज्ञान और स्वयंप्रभा है। इसके पश्चात उन्होंने लंकाकांड के प्रसंग में सेतुबंध और रामेश्वर स्थापना का वर्णन किया तथा बताया कि अगले दिन रामकथा का समापन होगा।
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