देहरादून, 23 मार्च 2026।उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों की पहचान रही हस्तचालित चक्की (जांदरा/जांजो) और जलधारा से चलने वाली पनचक्की (घराट) अब धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी हैं।
कभी हर घर की जरूरत और परंपरा का अहम हिस्सा रहे ये साधन आज आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटते जा रहे हैं, जिससे पहाड़ी संस्कृति पर भी असर साफ दिखने लगा है।
गांवों की पहचान थे जांदरा और घराट
पहाड़ों के ग्रामीण जीवन में जांदरा हर घर की धड़कन हुआ करता था, जहां महिलाएं सुबह-शाम अनाज पीसते हुए लोकगीत गाया करती थीं।
यह सिर्फ एक काम नहीं बल्कि सामाजिक जुड़ाव और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा था, जो अब तेजी से खत्म हो रहा है।
वहीं घराट, नदियों और गाड़-गदेरों के पानी से चलने वाली एक पर्यावरण अनुकूल तकनीक थी, जिसमें बिना बिजली के आटा पिसा जाता था।
आधुनिकता ने बदली तस्वीर
बिजली और डीजल से चलने वाली आटा चक्कियों के बढ़ते उपयोग ने जांदरा और घराट को लगभग समाप्त कर दिया है।
इसके साथ ही पहाड़ों से हो रहे पलायन और जल स्रोतों के सूखने से घराटों का संचालन भी मुश्किल होता जा रहा है।
नई पीढ़ी का इन पारंपरिक तरीकों से दूर होना भी इनके अस्तित्व पर बड़ा खतरा बन गया है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण से गहरा जुड़ाव
विशेषज्ञों का मानना है कि जांदरा और घराट में पिसा आटा ज्यादा पौष्टिक होता है, क्योंकि इसमें अनाज के प्राकृतिक पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं।
साथ ही ये साधन पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता और पारंपरिक ज्ञान का बेहतरीन उदाहरण हैं।
संरक्षण की बढ़ती जरूरत
स्थानीय लोगों के अनुसार यदि इन पारंपरिक तकनीकों को समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल कहानियों और किताबों में ही जान पाएंगी।
ग्रामीण पर्यटन से जोड़कर और सरकारी योजनाओं के माध्यम से इनका पुनर्जीवन संभव है, जिससे रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
क्या कहता है यह संदेश?
जांदरा और घराट केवल अनाज पीसने के उपकरण नहीं हैं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के साथ संतुलन का प्रतीक हैं।
इनका संरक्षण आज की जरूरत है, ताकि हमारी यह अनमोल विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।
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