Site icon My Uttarakhand News
Subscribe for notification

Uttarakhand News: संजीव चतुर्वेदी मामले में बना रिकॉर्ड ।16 वें न्यायाधीश ने भी किया ख़ुद को अलग – पर्वतजन

 देहरादून/नैनीताल। उत्तराखंड कैडर के आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई से लगातार न्यायाधीशों के अलग होने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
अब इस श्रृंखला में नैनीताल उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस आलोक वर्मा का नाम भी जुड़ गया है। उन्होंने चतुर्वेदी द्वारा दायर अवमानना याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया है।
इस तरह अब तक कुल 16 न्यायाधीशऐसे हो चुके हैं जिन्होंने किसी न किसी स्तर पर चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग किया है।

यह याचिका केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के सदस्यों और रजिस्ट्री के खिलाफ जानबूझकर नैनीताल उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश की अवहेलना करने के आरोप में दायर की गई थी।
जस्टिस आलोक वर्मा का यह कदम विशेष रूप से इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि वह 29 अगस्त 2025 तक मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई कर रहे थे।
सिर्फ 12 दिन पहले, नैनीताल उच्च न्यायालय के ही जस्टिस रवींद्र मैथानी ने भी चतुर्वेदी के एक अन्य मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग करते हुए आदेश दिया था कि “यह मामला ऐसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, जिसका मैं सदस्य न हूं।”
गौरतलब है कि अब तक सुनवाई से अलग होने वाले न्यायाधीशों में से किसी ने भी अपने निर्णय का कारण सार्वजनिक नहीं किया है।
 अब तक का रिकॉर्ड
इस वर्ष यह छठा न्यायिक रिक्यूजल (स्वयं को अलग करने का मामला) है।

फरवरी 2025 में, कैट के दो सदस्य हरविंदर ओबेराय और बी. आनंद ने बिना कारण बताए सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।
अप्रैल 2025 में, नैनीताल एसीजेएम नेहा कुशवाहा ने भी उनके एक मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।
इससे पहले भी दो उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई से दूरी बना ली थी।

अब तक के कुल 16 न्यायाधीशों में शामिल हैं —दो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश (जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस यू.यू. ललित), चार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, दो निचली अदालतों के न्यायाधीश तथा केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आठ सदस्य, जिनमें एक सदस्य पूर्व में कैट के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
पुराने मामलों की पृष्ठभूमि
चतुर्वेदी ने एम्स, दिल्ली में मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) के रूप में रहते हुए कई बड़े भ्रष्टाचार मामलों का खुलासा किया था। इसके बाद उनके खिलाफ प्रतिशोधात्मक कार्रवाई होने के आरोप लगे।
वर्ष 2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के रवैये को “प्रथम दृष्ट्या प्रतिशोधात्मक” बताते हुए उस पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया था, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखते हुए ₹50,000 कर दिया।
वर्ष 2021 में भी, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने चतुर्वेदी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से संबंधित मामले में अपने पूर्व रुख को दोहराया था। केंद्र सरकार ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जिसके बाद मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने यह मामला बड़ी पीठ को भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायिक घटनाक्रम

नवंबर 2013 में, जस्टिस रंजन गोगोई ने उस समय सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था जब चतुर्वेदी ने हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की थी।
अगस्त 2016 में, जस्टिस यू.यू. ललित ने भी इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया था।
2018 में, शिमला की एक अदालत की न्यायाधीश ने भी विनीत चौधरी द्वारा दायर मानहानि मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।
2019 में, कैट के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस एल. नरसिंहान रेड्डी ने “दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं” का हवाला देते हुए स्वयं को अलग किया था।
2021 में, कैट के जस्टिस आर.एन. सिंह ने भी चतुर्वेदी की प्रतिनियुक्ति मामले से दूरी बना ली थी।
2023 और 2024 में भी कई बार कैट के न्यायाधीशों, जैसे मनीष गर्ग, छबीलेंद्र रौल, और राजीव जोशी, ने भी सुनवाई से अलग होने का निर्णय लिया।

न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा
जस्टिस आलोक वर्मा का हालिया कदम न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में एक बार फिर जिज्ञासा और चर्चा का विषय बन गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी एक व्यक्ति के मामलों से इतने अधिक न्यायाधीशों का स्वयं को अलग कर लेना देश के न्यायिक इतिहास में अभूतपूर्व घटनाहै।

Exit mobile version