देहरादून। उत्तराखण्ड में गढ़वाल और कुमाऊं दो मण्डल हैं। राजनैतिक तौर पर कांग्रेस और भाजपा समेत सभी दल इन मण्डलों के बीच संतुलन बनाकर ही अपनी रणनीति तैयार करते आए हैं। सरकार किसी भी दल की हो अक्सर होता यह है कि मुख्यमंत्री यदि कुमाऊं से हुआ तो सत्ताधारी दल का अध्यक्ष गढ़वाल से होता है। गढ़वाल से मुख्यमंत्री होने पर संगठन के प्रदेश अध्यक्ष पद पर इसी तरह की तवज्जो कुमाऊं को दी जाती है। कैबिनेट में भी दोनों मण्डलों को तकरीबन बराबर प्रतिनिधित्व देकर संतुलन बैठाया जाता है। मौजूदा समय में भी लगभग यही स्थिति है। बावजूद इसके विरोधी तत्व आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी सरकार और संगठन में कम प्रतिनिधित्व देकर गढ़वाल मण्डल की उपेक्षा कर रही है। आरोप कुछ भी लगाये जाएं लेकिन आंकड़ों से तस्वीर साफ हो जाती है।
धामी सरकार में मुख्यमंत्री के अलावा कुल 11 मंत्री बनाए जा सकते हैं। फिलवक्त सरकार में कुल 7 मंत्री हैं जबकि चार पद रिक्त हैं। तीन पद सरकार गठन के वक्त से ही रिक्त रखे गए थे जबकि एक पद कैबिनेट मंत्री चन्दनराम दास के निधन से खाली हुआ है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कैबिनेट में जो 7 मंत्री हैं उनमें से पांच मंत्री सतपाल महाराज, प्रेमचन्द अग्रवाल, धन सिंह रावत, गणेश जोशी और सुबोध उनियाल गढ़वाल मण्डल से हैं, जबकि विधानसभा अध्यक्ष ऋतु भूषण खण्डूड़ी भी गढ़वाल क्षेत्र (कोटद्वार विधानसभा) से ही हैं। पैतृक गांव को आधार बनाएं तो कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा भी गढ़वाल से ही माने जा सकते हैं।
पार्टी संगठन की बात करें तो प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट न सिर्फ प्रदेश भाजपा की कमान संभाले हुए हैं बल्कि उन्हें राज्यसभा का सांसद भी बनाया गया है। उनके अलावा, नरेश बंसल (देहरादून) और कल्पना सैनी (रुड़की, हरिद्वार) गढ़वाल मण्डल के ही निवासी हैं जो संसद के उच्च सदन राज्यसभा में उत्तराखण्ड का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि प्रतिनिधित्व के मामले में गढ़वाल की उपेक्षा का आरोप सरासर बेबुनियाद है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बात करें तो वह अपने सत्ताधारी दल के विधायकों का बराबर मान, सम्मान और आदर करते हैं यहां तक कि विपक्ष के विधायकों के लिए भी उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं। किसी भी विधानसभा क्षेत्र के विकास को लेकर धामी सत्ता पक्ष और विपक्ष का भेद कभी नहीं करते।
बावजूद इसके सोशल मीडिया में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि कुछ लोग राजनैतिक अस्थिरता फैलाने का मंसूबा पाले हुए हैं। कुछ लोग क्षेत्रवाद को हवा देकर गढ़वाल की उपेक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि मौजूदा समय में विकास को लेकर गढ़वाल और कुमाऊं मण्डल के बीच गजब का संतुलन बना हुआ है। सरकार और संगठन में प्रतिनिधित्व देखें तो गढ़वाल को कुमाऊं पर तरजीह दी गई है।
देहरादून; आज दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का प्रस्तावित प्रदर्शन है। हालांकि…
कैंची धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से पक्षियों पर बड़ा संकट, नैनीताल की पहाड़ियों…
लिंगानुपात में असमानता वाले गांवों को रेड जोन में किया जाएगा चिह्नित, भ्रूण लिंग परीक्षण…
स्कूल-कॉलेजों में चलेगा जागरूकता एवं ड्रग्स टेस्टिंग अभियान, दो नई टेस्टिंग मशीनों के लिए धनराशि…
my uttarakhand news Bureau Dehradun, 7 Oct: BJP State Spokesperson Ravindra Jugran met Dehradun Mayor…
my uttarakhand news Bureau Dehradun, 7 Oct: Governor Lieutenant General Gurmit Singh (Retd.) unveiled the…