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उत्तराखंड में क्यों मनाई जाती है 11 दिन बाद दिवाली…जानें क्या है इगास बुग्याल की परंपरा! – myuttarakhandnews.com

उत्तराखंड में दीपावली के 11 दिन बाद इगास मनाया जाता है, जो पहाड़ी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है. इस दिन घरों को सजाया जाता है, विशेष पकवान बनते हैं, और लोक नृत्य व संगीत का आयोजन होता है. इस समय पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल रहता है और लोग आपस में खुशियां बांटते हैं.
कैसे मनाते हैं दिवालीदीपावली के बाद आने वाली एकादशी को इगास बग्वाल को मनाया जाता है. जिसमें लकड़ियों का गट्ठर बनाकर उन्हें जलाकर भेलों खेला जाता है. इस दौरान लोग पारंपरिक वेशभूषा में नजर आते हैं और पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं. इस दिन सुबह से ढोल और दमाऊं (एक पारंपरिक वाद्य) की आवाज गूंजने लगती है, जिसे देवता को जगाने का माध्यम बताया जाता है. वहीं घरों में पकवान बनाए जाते हैं और भोग देवताओं को लगता है. फिर महिला-पुरुष अपनी पहाड़ी पारंपरिक वेश-भूषा में तैयार होते हैं. घरों में, चौक-चबारों में और हर कोने-कोने में दीपक जलाए जाते हैं. देवताओं के स्थानों को भी दीप मालिकाओं से प्रकाशित किया जाता है.
पारंपरिक लोकगीतों का भी मंचनइजाज बग्वाल की पूर्व संध्या पर कृषि मंत्री गणेश जोशी ने देहरादून के शहीद दुर्गामल पार्क में गढ़ी कैंट गढ़वाल सभा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा किया. इस मौके पर स्थानीय लोग भी मौजूद रहे पारंपरिक लोकगीतों का भी मंचन किया गया.कृषि मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि इगास पर्व उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति और परम्पराओं का सजीव प्रतीक है. यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने का संदेश देता है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पारंपरिक पर्वों और सांस्कृतिक आयोजनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कोशिश हो रही है.
मंत्री जोशी ने प्रदेशवासियों को इगास पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और नई ऊर्जा लेकर आए. कार्यक्रम में कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी सहित गढ़ी कैंट गढ़वाल सभा के पदाधिकारी सहित स्थानीय लोग उपस्थित रहे.
 

Nandni sharma

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