Dehradun/Lucknow/New Delhi : उत्तराखंड में वर्षों से लिया गया ‘अविरल और निर्मल गंगा’ का संकल्प अब जमीन पर साफ दिखने लगा है। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत न सिर्फ 37 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं, बल्कि सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता में दस गुना तक की ऐतिहासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2014 से पहले जहां यह क्षमता महज 18 एमएलडी थी, वह अब बढ़कर 200 एमएलडी तक पहुंच गई है। इसका असर अगले वर्ष होने वाले अर्धकुंभ में साफ दिखाई देगा, जब श्रद्धालु पहले से कहीं अधिक स्वच्छ गंगा में आस्था की डुबकी लगाएंगे। प्रदेश में नमामि गंगे कार्यक्रम की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गंगा में गिरने वाले 170 में से 155 नालों को टैप कर दिया गया है, जबकि शेष 15 नालों के लिए 11 नए एसटीपी का निर्माण युद्धस्तर पर जारी है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के डीडीजी नलिन कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि नमामि गंगे के अंतर्गत अब तक कुल 37 परियोजनाएं उत्तराखंड में पूरी की जा चुकी हैं। जिसके फलस्वरूप राज्य में 200 एमएलडी क्षमता वाले 50 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) स्थापित हुए हैं। इस विस्तार ने नदी में बिना उपचारित अपशिष्ट जल के प्रवाह को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। केवल संयंत्र निर्माण ही नहीं, बल्कि इनकी कार्यप्रणाली की निगरानी के लिए ‘गंगा पल्स पोर्टल’ जैसा डिजिटल नवाचार भी किया गया है। यह पोर्टल एसटीपी के प्रदर्शन की रियल-टाइम निगरानी सुनिश्चित करता है और सार्वजनिक डोमेन में होने के कारण जवाबदेही भी तय करता है।
डिजिटल निगरानी से प्रदूषण पर प्रहार
मैदानी स्तर पर निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए ‘ड्रेन डैशबोर्ड’ नामक टूल प्रभावी सिद्ध हो रहा है। यह डैशबोर्ड नदी में गिरने वाले नालों की पल-पल की ट्रैकिंग करता है। इसमें नालों की टैपिंग स्थिति और सीवेज को एसटीपी तक मोड़ने की प्रक्रिया की लाइव मॉनिटरिंग की सुविधा है। यह वास्तविक समय में प्रदूषण जोखिम की पहचान कर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करता है, जिससे व्यवस्था में पारदर्शिता आई है।
पहाड़ी भूगोल के लिए सटीक रणनीति
उत्तराखंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए ‘इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन’ दृष्टिकोण अपनाया गया है। पहाड़ी क्षेत्रों में व्यापक सीवरेज नेटवर्क बिछाना चुनौतीपूर्ण है, इसलिए खुले नालों के पानी को नदी में गिरने से पहले ही ‘इंटरसेप्ट’ कर शोधन के लिए मोड़ दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्ण भूमिगत नेटवर्क की तुलना में यह तकनीक अधिक प्रभावी है क्योंकि यह प्रदूषण के भार को नदी के मुहाने पर ही समाप्त कर देती है।
सुधर रही गंगा की सेहत: सीपीसीबी की रिपोर्ट
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की जल गुणवत्ता रिपोर्ट-2025 इस मिशन की सफलता की पुष्टि करती है। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में गंगा अब “अप्रदूषित” श्रेणी में है। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) का स्तर 3 एमजी/लीटर से कम है, जो एक स्वस्थ नदी का मानक है। वहीं, घुलित ऑक्सीजन (डीओ) का स्तर भी जलीय जीवन के लिए पूरी तरह सुरक्षित पाया गया है। जैविक आकलन के अनुसार, जल की गुणवत्ता “बहुत अच्छी” से “अच्छी” श्रेणी के बीच बनी हुई है।
पारिस्थितिकी और जैव विविधता का पुनरुद्धार
गंगा स्वच्छता के प्रयास केवल नालों को रोकने तक सीमित नहीं हैं। पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर वनीकरण और जलीय जैव विविधता की पुनर्स्थापना की गई है। नदियों में मछलियों की प्रजातियों में हुई वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि गंगा का स्वास्थ्य सुधर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड का यह मॉडल आने वाले वर्षों में निचले मैदानी क्षेत्रों के लिए मार्गदर्शक बनेगा। अब देवभूमि की गंगा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि स्वच्छता के वैश्विक मानकों पर भी खरी उतर रही है।
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