इलाज के नाम पर लूट: 2 घंटे में 80 हजार बिल, शव सौंपने से इनकार! – पर्वतजन

हल्द्वानी (नैनीताल)। उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक निजी अस्पताल द्वारा इलाज के दौरान मरीज की मौत के बाद बकाया राशि की वजह से पार्थिव शरीर सौंपने से मना करने का मामला सामने आया है। पुलिस के त्वरित हस्तक्षेप से परिजनों को शव सौंपा गया और मृत्यु प्रमाण पत्र भी जारी कराया गया।
 
जानकारी के अनुसार, अल्मोड़ा जिले के धारानौला क्षेत्र के गोलना करड़िया गांव निवासी नंदन सिंह बिरौड़िया की पत्नी सीमा बिरौड़िया गंभीर रूप से बीमार हो गई थीं। उन्हें अल्मोड़ा के बेस अस्पताल से रेफर कर हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान उनकी स्थिति बिगड़ गई और मौत हो गई।

 
अस्पताल प्रशासन ने इलाज का कुल बिल 80 हजार रुपये बनाया। परिजनों ने पहले ही 57 हजार रुपये जमा कर दिए थे, लेकिन शेष 30 हजार रुपये की मांग पर अड़ गया। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार होने के कारण परिजन अतिरिक्त राशि नहीं जमा कर पाए, जिसके बाद अस्पताल ने पार्थिव शरीर सौंपने से इनकार कर दिया। इससे परिवार अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रहा था।
 
3 जनवरी की रात नंदन सिंह बिरौड़िया ने नैनीताल के एसएसपी मंजूनाथ टीसी से फोन पर संपर्क कर अपनी व्यथा सुनाई। एसएसपी ने तुरंत हल्द्वानी सिटी सीओ अमित कुमार और कोतवाली प्रभारी विजय मेहता को निर्देश दिए। पुलिस टीम ने अस्पताल पहुंचकर हस्तक्षेप किया, जिसके बाद पार्थिव शरीर परिजनों को सौंप दिया गया। साथ ही मृत्यु प्रमाण पत्र भी तैयार कराया गया।
 
पुलिस ने अस्पताल प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसी अमानवीय घटना दोहराई नहीं जाए और मानवीय संवेदनाओं का सम्मान किया जाए। एसएसपी मंजूनाथ टीसी ने कहा कि इस मामले में अस्पताल के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
 
एसएसपी ने आगे बताया, “देर रात एक कॉल आया जिसमें बताया गया कि निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मरीज की मौत हो गई। मात्र दो घंटे के इलाज का बिल 80 हजार रुपये बनाया गया। परिजनों ने 57 हजार रुपये जमा कर दिए थे, लेकिन शेष राशि मांगकर शव सौंपने से इनकार किया जा रहा था। सूचना मिलते ही टीम भेजकर शव परिजनों को सौंपवाया गया और प्रमाण पत्र जारी कराया गया। अस्पताल के विरुद्ध कार्रवाई होगी।”
 
यह घटना निजी स्वास्थ्य सेवाओं में संवेदनशीलता की कमी को उजागर करती है। पुलिस की सक्रियता से परिवार को राहत मिली, लेकिन ऐसे मामलों पर सख्त नियामक कदम उठाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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