रिपोर्ट/बिजेंद्र राणा
राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा गया हैं इन दिनों एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम के चर्चा केंद्र में ऋषिकेश है। वरिष्ठ भाजपा नेता भगत राम कोठारी द्वारा पार्टी से इस्तीफा और उसके तुरंत बाद उनकी पत्नी चारु कोठारी को दायित्वधारी के रूप में राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद की उपाध्यक्ष नियुक्त किया जाना केवल एक सामान्य राजनीतिक निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके पीछे कई स्तरों पर राजनीतिक संदेश और रणनीतियां देखी जा रही हैं।भाजपा को लंबे समय से एक अनुशासित और विचारधारा आधारित संगठन के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। पार्टी का दावा रहा है कि यहां कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक सभी संगठनात्मक मर्यादाओं का पालन करते हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत समय-समय पर इससे अलग तस्वीर भी दिखाती रही है, जब वरिष्ठ नेता सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया के जरिए अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को न्याय की चादर ओढाकर पार्टी के अनुशासन को तार तार करते हुए नजर आए।वरिष्ठ भाजपाई नेता भगत राम कोठारी का इस्तीफा भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। पूर्व सरकार में राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त कर चुके कोठारी ने पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे “राजनीतिक सुविधा देने वाली पार्टी” तक कह दिया। यह बयान न केवल उनके असंतोष को दर्शाता है, बल्कि संगठन के भीतर चल रही खींचतान की ओर भी इशारा करता है।लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और चर्चित पहलू है—इस्तीफे के तुरंत बाद उनकी पत्नी चारु कोठारी को महत्वपूर्ण दायित्व दिया जाना। आमतौर पर, किसी नेता के पार्टी छोड़ने के बाद उसके परिवार को संगठनात्मक या सरकारी जिम्मेदारी देना असामान्य माना जाता है। ऐसे में यह निर्णय कई राजनीतिक सवालों को जन्म देता है।
सबसे पहला सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में एक संयोग है या फिर एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति? यदि कोठारी का इस्तीफा पार्टी के प्रति अविश्वास और असंतोष का परिणाम था, तो फिर उसी परिवार पर पार्टी का यह त्वरित विश्वास किस आधार पर टिका है?दूसरा बड़ा पहलू क्षेत्रीय राजनीति से जुड़ा हुआ है। ऋषिकेश में वर्तमान विधायक को 2027 विधानसभा के लिए मजबूत और प्रभावशाली भाजपा प्रत्याशी के रूप मे देखा जा रहा है । संगठन और सरकार दोनों में उनकी पकड़ मानी जाती है। हालांकि, उनके कुछ बयानों और विवादों के चलते वे समय-समय पर आलोचना के केंद्र में भी रहे हैं।
ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह मानता है कि कोठारी परिवार को दायित्व देकर पार्टी एक संतुलनकारी रणनीति अपना रही है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर किसी एक नेता का वर्चस्व कम करना और संभावित दावेदारों को सक्रिय बनाए रखना हो सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह कदम संभावित टिकट दावेदारों को साधने और असंतोष को नियंत्रित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
यह भी उल्लेखनीय है कि भगत राम कोठारी स्वयं कई बार सार्वजनिक मंचों से चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके हैं। उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि “अब तक मैंने दूसरों के लिए वोट मांगे हैं, अब अपने लिए समर्थन चाहता हूं।” इस बयान से उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा स्पष्ट झलकती है। ऐसे में उनका इस्तीफा केवल असंतोष का परिणाम नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दबाव बनाने का तरीका भी माना जा सकता है।
इसके साथ ही, इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा की आंतरिक पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि पार्टी अनुशासन और सिद्धांतों को सर्वोपरि मानती है, तो फिर इस प्रकार के निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं? क्या यह संगठनात्मक मजबूरी है या फिर बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अपनाई गई व्यावहारिक नीति?
जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच भी यह चर्चा तेज हो गई है। कई कार्यकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि कोई नेता सार्वजनिक रूप से पार्टी पर सवाल उठाता है और इस्तीफा देता है, तो क्या उसे या उसके परिवार को इस तरह का राजनीतिक “समायोजन” मिलना संगठन के अनुशासन के अनुरूप है?
कुल मिलाकर, ऋषिकेश का यह घटनाक्रम भाजपा के भीतर चल रही आंतरिक राजनीति, नेतृत्व संतुलन और चुनावी रणनीति की एक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करता है। यह केवल एक व्यक्ति या परिवार का मामला नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि किस प्रकार बड़े राजनीतिक दल समय-समय पर अपने संगठनात्मक और चुनावी हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं।अब देखने वाली बात यह होगी कि इस निर्णय का भाजपा के संगठन, कार्यकर्ताओं के मनोबल और आगामी चुनावी समीकरणो और किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है।
