देहरादून। देहरादून की जिला अदालत ने एक बेहद शर्मनाक और दिल दहला देने वाले मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ वर्षों तक दुष्कर्म करने के दोषी एयरफोर्स कर्मी को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोषी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है और पीड़िता को राज्य सरकार की ओर से तीन लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश दिए गए हैं।कोर्ट ने इस मामले को “विकृत कामुकता” करार देते हुए कहा कि इस तरह के कृत्य बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बेहद घातक हैं और समाज के लिए कलंक हैं।
5 साल की उम्र से शुरू हुआ था दर्दनाक सिलसिला
पीड़िता ने अदालत को बताया कि जब वह महज पांच साल की थी, तभी से उसका पिता उसे डराकर और धमकाकर गलत काम करता रहा। आरोपी ने मथुरा, गुजरात और देहरादून में अपनी पोस्टिंग के दौरान कई बार बेटी के साथ दुष्कर्म किया।
इतना ही नहीं, जब आरोपी ड्यूटी पर बाहर रहता था तो वह वीडियो कॉल के जरिए भी बेटी को कपड़े उतारने के लिए मजबूर करता था। मना करने पर मारपीट की धमकी दी जाती थी। यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक पीड़िता 17 साल की नहीं हो गई।
17 साल की उम्र में मां को बताया सच
17 वर्ष की उम्र में पीड़िता ने हिम्मत जुटाकर अपनी मां को पूरी सच्चाई बताई। इसके बाद 17 नवंबर 2023 को रायपुर थाने में मां की शिकायत पर आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।विशेष लोक अभियोजक अल्पना थापा ने बताया कि अदालत ने पीड़िता की गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया और बुधवार को सजा सुनाई।
बचाव पक्ष की दलील खारिज
बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि मेडिकल रिपोर्ट में चोट के निशान नहीं थे और हाइमन सुरक्षित था, इसलिए दुष्कर्म नहीं हुआ। अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
विशेष न्यायाधीश अर्चना सागर की अदालत ने कहा कि कोई भी बेटी अपने सगे पिता पर इस तरह के गंभीर और झूठे आरोप नहीं लगाएगी। जैसे-जैसे पीड़िता बड़ी हुई, उसे अपने साथ हो रहे अपराध की समझ आई और उसने सच सामने लाने का साहस किया।
बीमार बच्चों की वजह से सालों तक चुप रहीं मां-बेटी
पीड़िता के दो छोटे भाई हैं। एक भाई डाउन सिंड्रोम से पीड़ित है, जबकि दूसरे को ब्लड कैंसर है। बच्चों के इलाज और घर के खर्च के लिए मां-बेटी आरोपी पर निर्भर थीं, इसी वजह से वे लंबे समय तक चुप रहीं।लेकिन आखिरकार 17 नवंबर 2023 को सब्र का बांध टूट गया और सच सामने आ गया।
अदालत के इस फैसले को महिला और बाल सुरक्षा के लिए एक अहम और कड़ा संदेश माना जा रहा है।
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