चाय बागान भूमि से भी बड़ा घोटाला, भूमाफियाओं ने वनभूमि को धोखाधड़ी से निजी व्यक्तियों को बेचा, विकेश नेगी ने मुख्यमंत्री, वन मंत्री, और अधिकारियों को भेजी शिकायत
देहरादून। अधिवक्ता और आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने सिविल कोर्ट परिसर देहरादून, शहीद स्मारक के पास, चेंबर नं. 1A में प्रेसवार्ता करते हुए कहा कि देहरादून में सरकारी अधिग्रहीत वन भूमि पर बड़े पैमाने पर अवैध अतिक्रमण का एक गंभीर मामला सामने आया है। यह भूमि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचनाओं के अनुसार 11 अक्टूबर 1952 (अधिसूचना संख्या 617/XIV), 29 जून 1953 (अधिसूचना संख्या 770/XIV-319/1952), और 3 सितंबर 1953 (अधिसूचना संख्या 1164/XIV-333/1953) के तहत अधिग्रहित की गई थी। इन अधिसूचनाओं में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया गया था कि कौन-कौन सी भूमि सरकार के अधीन रहेगी।
अधिवक्ता और आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि इसके बावजूद, कुछ भूमाफियाओं ने इन वन भूमि को धोखाधड़ी से निजी व्यक्तियों को बेचकर पंजीकृत कर दिया है। इन गांवों – क्याटकुली भट्टा, चलांग, अम्बारी, डंडा जंगल, रुद्रपुर आदि-की भूमि, जो 11 अक्टूबर 1952 की उत्तर प्रदेश राजपत्र अधिसूचना के अनुसूची II में सूचीबद्ध हैं, उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत संरक्षित है। यह भूमि न तो बेची जा सकती है और न ही किसी निजी व्यक्ति द्वारा खरीदी जा सकती है।
इसके अलावा, 8 अगस्त 1946 को जारी उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम के अनुसार, 8 अगस्त 1946 के बाद किए गए किसी भी भूमि अनुबंध को अवैध घोषित किया गया था। इस कानून के अनुसार, इस तारीख के बाद की गई किसी भी भूमि बिक्री या खरीद का कोई कानूनी आधार नहीं है और वह शून्य मानी जाती है। इसके बावजूद, कई व्यक्तियों ने अब इन वन भूमि के पंजीकृत दस्तावेज प्राप्त कर लिए हैं, जो पूरी तरह से अवैध हैं।
अधिवक्ता और आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि इस अवैध अतिक्रमण और भूमि कब्जे का न केवल वन संरक्षण कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि यह हमारे क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है। सर्वोच्च न्यायालय के 2009 के सिविल अपील नंबर 7017 में दिए गए फैसले में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि 11 अक्टूबर 1952 की गजट अधिसूचना एक महत्वपूर्ण कट-ऑफ तिथि है, जिसके बाद किसी भी वन भूमि की बिक्री या खरीद अवैध मानी जाएगी।
अधिवक्ता और आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि इसके बावजूद, राज्य सरकार की अधीनस्थ एजेंसियों, राजस्व विभाग, वन विभाग, और मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण ने इन सरकारी और वन भूमि पर अवैध निर्माण और बिक्री की अनुमति दी है। यह न केवल वन संरक्षण की दृष्टि से आपत्तिजनक है, बल्कि पर्यावरणीय क्षति और जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।
अधिवक्ता और आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि मैंने इस गंभीर मामले को लेकर माननीय मुख्यमंत्री, वन मंत्री, और अन्य अधिकारियों को एक औपचारिक शिकायत भेजी है, जिसमें तत्काल कार्रवाई की मांग की गई है। अधिवक्ता और आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि हम मांग करते हैं कि:
1. दोषियों और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाए।2. सभी भूमि रिकॉर्ड की समीक्षा और सुधार सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार की जाए।3. वन भूमि पर अवैध खरीद-बिक्री और निर्माण कार्यों पर तुरंत रोक लगाई जाए।
अधिवक्ता और आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि जनता और पर्यावरण की रक्षा के लिए इस मामले में त्वरित और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। अवैध अतिक्रमण को रोका जाए और हमारी प्राकृतिक धरोहर को संरक्षित किया जाए।
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