टिहरी में बढ़ती भिलंगना झील से बड़ा खतरा, केदारनाथ जैसी त्रासदी की आशंका – myuttarakhandnews.com

देहरादून। उत्तराखंड में एक और बड़ी प्राकृतिक आपदा का खतरा मंडराने लगा है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने टिहरी जिले के घनसाली क्षेत्र में दूधगंगा ग्लेशियर के पिघलने से तेजी से बढ़ रही भिलंगना झील को गंभीर खतरे की श्रेणी में रखा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि झील टूटती है तो निचले इलाकों में भारी तबाही हो सकती है।
 
45 साल में झील का फैलाव कई गुना बढ़ा
 
भिलंगना झील का निर्माण 1980 के आसपास शुरू हुआ था, लेकिन बीते 45 वर्षों में इसका आकार लगातार बढ़ता गया है। अब यह झील करीब 1.204 किलोमीटर लंबी और लगभग 528 मीटर चौड़ी हो चुकी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि झील में लगभग 10 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी भरा है। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी (NDMA) ने भी इसे “सबसे खतरनाक झीलों” की कैटेगरी में रखा है।
 
ग्लेशियर 0.7 मीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से पिघल रहा है
 
वाडिया संस्थान और देश के कई अन्य शोध संस्थानों ने 1968 से 2025 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन से पता चला कि दूधगंगा ग्लेशियर हर साल लगभग 0.7 मीटर की रफ्तार से पिघल रहा है। ग्लेशियर के तेज पिघलने से झील का आकार भी तेजी से बढ़ रहा है, जिससे खतरा और गहरा गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर झील आउटब्रस्ट हुई तो पानी लगभग 30 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नीचे की ओर बह सकता है।
 
भिलंगना बेसिन में झीलों की संख्या में 47% की बढ़ोतरी
 
भिलंगना नदी बेसिन में कुल 36 ग्लेशियर मौजूद हैं, जिनका संयुक्त क्षेत्रफल करीब 78 वर्ग किलोमीटर है। इसके अलावा क्षेत्र में 11 अन्य ग्लेशियर–जनित झीलें भी हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 0.61 वर्ग किलोमीटर है। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2000 से 2020 के बीच इस इलाके में झीलों की संख्या में 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो जलवायु परिवर्तन की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
 
निचले इलाकों में तबाही की आशंका
 
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि झील को कोई नुकसान पहुंचता है या झील टूटती है, तो भिलंगना घाटी, घनसाली और आसपास के कई गांव बुरी तरह प्रभावित होंगे। लाखों क्यूबिक मीटर पानी पलक झपकते ही निचले क्षेत्रों में पहुंचकर बड़े पैमाने पर विनाश की स्थिति पैदा कर सकता है।
 
वैज्ञानिकों ने तुरंत निगरानी बढ़ाने की सलाह दी
 
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वैज्ञानिकों ने राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को तुरंत निगरानी बढ़ाने और संभावित आपदा को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने की सलाह दी है। उनका कहना है कि अभी से सतर्कता बरती गई तो आने वाली किसी बड़ी त्रासदी को टाला जा सकता है।

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pooja Singh

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