चातुर्मास में आध्यात्मिक ज्ञान की वर्षा से सराबोर हो रहे श्रद्धालु –

 
देहरादून। चातुर्मास के पावन अवसर पर गांधी रोड स्थित जैन धर्मशाला में इन दिनों भक्ति, साधना और आध्यात्मिक चिंतन का अद्भुत वातावरण बना हुआ है। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागरजी महाराज के आशीर्वाद से परम पूज्य आध्यात्मिक श्रमणी आर्यिका रत्न श्री 105 पूर्णमति माताजी ससंघ विराजमान हैं। उनके सानिध्य में प्रतिदिन पूजन, धार्मिक अनुष्ठान एवं प्रवचनों का आयोजन हो रहा है। बारिश की बूंदों के साथ श्रद्धालु आध्यात्मिक ज्ञान की वर्षा से भी सराबोर हो रहे हैं। जैन समाज के साथ अन्य धर्मों के लोग भी बड़ी संख्या में प्रवचन एवं धार्मिक आयोजनों में सहभागिता कर रहे हैं।
प्रवचन में आर्यिका रत्न पूर्णमति माताजी ने लोक और अलोक के स्वरूप को समझाते हुए कहा कि इस लोकाकाश में छह द्रव्य विद्यमान हैं, जबकि अलोकाकाश में केवल आकाश द्रव्य है। जीव, पुद्गल आदि छह द्रव्यों से लोक भरा हुआ है। उन्होंने कहा कि जो आत्मा जीव और अजीव का भेद नहीं जानती, वह आश्रव और बंधन में पड़ती है। वहीं जो आत्मा स्वयं को अजीव से भिन्न जानती है, उसमें संवर और निर्जरा का भाव प्रकट होता है। आत्मा में पूर्ण रूप से लीन होने वाला जीव मोक्ष पद को प्राप्त कर सर्वथा निर्बंध हो जाता है।
उन्होंने कहा कि प्रकाश, ध्वनि, जल, शब्द, बंध, सौंदर्य, संसार और शरीर आदि सभी पुद्गल की विभाव व्यंजन पर्यायें हैं। जीव इनसे भेद नहीं कर पाने के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता। आत्मा के चैतन्यस्वरूप को पहचानते हुए यदि मनुष्य यह अनुभव करे कि ‘मैं चैतन्यस्वरूपी हूं, सबसे शक्तिशाली हूं’, तो वह जड़ कर्मों को भेदने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
उपादान के जागरण से ही संभव है वास्तविक परिवर्तन
माताजी ने कहा कि जैन धर्म क्षत्रियों का धर्म है। आज मनुष्य के भीतर कषायें निरंतर बढ़ती जा रही हैं। अज्ञानी व्यक्ति सोचता है कि वस्तु को बदल देने से सब कुछ बदल जाएगा, जबकि वास्तविक परिवर्तन भीतर से होता है। उपादान के जाग्रत हुए बिना परिवर्तन संभव नहीं है। इसलिए सबसे पहले अपने उपादान को जाग्रत करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि पूर्व के पापों को लेकर रोते नहीं रहना चाहिए, बल्कि उदय को जीतने का प्रयास करना चाहिए। आत्मा को कर्मों से भिन्न जानना और अपने दोष को पहचानना जरूरी है। यदि मुझसे दोष हुआ है, तभी आज उसका उदय आया है। उदय के बारे में जितना अधिक चिंतन करेंगे, उतना ही बंधन बढ़ता जाएगा।
विश्व के सभी जीवों के कल्याण का चिंतन करें
आर्यिका रत्न ने श्रद्धालुओं से कहा कि केवल अपने और अपनों के बारे में सोचने के बजाय पूरे विश्व के जीवों के कल्याण का चिंतन करना चाहिए। यह भावना रखनी चाहिए कि विश्व के सभी जीव सिद्ध हो गए हैं और सिद्धालय में अनंत जीव विराजमान हैं। सभी जीव सिद्धों के समान हैं तथा प्रत्येक वस्तु अपने-अपने स्वरूप में स्वतंत्र है।
उन्होंने कहा कि यदि स्वप्न भी देखना हो तो ऐसे देखें कि हम विमान में उड़ते हुए अकृत्रिम जिनचैत्यालयों के दर्शन कर रहे हैं। दिन में मनुष्य जैसा चिंतन करता है, वही उसके स्वप्नों में भी दिखाई देता है। सोच सम्यक होने पर आश्रव और बंध का क्षय तथा संवर-निर्जरा का प्राकट्य होता है।
इच्छाओं का दास बना जीव संसार में भटकता है
इष्टोपदेश का उल्लेख करते हुए माताजी ने कहा कि आचार्य भगवान ने इच्छा के संबंध में बताया है कि पहला गलत काम इच्छा करना है, दूसरा उस इच्छा को पूरा करने का उपाय सोचना और तीसरा उसे पूरा करने के लिए श्रम प्रारंभ करना। इच्छाओं का दास बना आत्मा भववन में भटकता रहता है।
उन्होंने कहा कि सच्चे सुख का साधन केवल एक है—अंतरमुख दृष्टि। मनुष्य पर पदार्थों को अपना मानता रहा, जबकि वे कभी उसके थे ही नहीं। चैतन्यस्वरूप आत्मा कभी पर की हुई ही नहीं। स्वयं को न जानने के कारण जीव पर पदार्थों को अपना मानकर भटकता रहा और अपना शाश्वत घर भूलकर दर-दर की ठोकरें खाता रहा।
माताजी ने कहा कि अब ऐसा अपना शाश्वत घर बनाना है, जहां से वापस संसार में नहीं आना पड़े। संसार के दुखों को भोगते-भोगते जीव ने अनंत पीड़ा सहन की है। इंद्रिय सुख और इंद्रियों के भोग वास्तव में व्याकुलता और कल्पना मात्र हैं। ये भोग रोगों की तरह आत्मा को आकुलित करते हैं। जब जीव कर्मों को अपनी इच्छा के अनुसार चलाना चाहता है तो नए कर्मों का बंध करता है और उन्हीं कर्मों का उदय आने पर संसार चक्र चलता रहता है।
उन्होंने कहा कि संसार में परिभ्रमण करते-करते जीव ने अनंत दुख भोगे हैं। अपने वास्तविक स्वरूप को भूलने के कारण वह चारों गतियों में भटकता रहा। इसी भाव को काव्य पंक्तियों के माध्यम से समझाते हुए कहा—
“भूल कर अपना घर, जाने कितनों के घर,
तुझको जाना पड़ा, तुझको जाना पड़ा।”
11 अगस्त को निकलेगी भगवान नेमिनाथ की भव्य बारात
मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि भगवान श्री नेमि कुमार (भगवान नेमिनाथ) की भव्य बारात एवं नगर भ्रमण का आयोजन 11 अगस्त 2026, मंगलवार को किया जाएगा। 1008 श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर, सरनीरमल हाउस, डिस्पेंसरी रोड, देहरादून से शाम 4:30 बजे भगवान श्री नेमि कुमार की दिव्य एवं भव्य बारात श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ नगर भ्रमण के लिए प्रस्थान करेगी। इस दौरान जगह-जगह भव्य मंगल स्वागत किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि सोमवार को आयोजित कार्यक्रमों के क्रम में शाम 5:30 बजे वात्सल्य भोजन, शाम 6:15 बजे पूज्य गुरुमां के सानिध्य में गुरु भक्ति तथा शाम 7:30 बजे बिनौली स्वागत यात्रा आयोजित की गई।
बिनौली स्वागत यात्रा जैन धर्मशाला से प्रारंभ होकर झंडा बाजार स्थित मंदिर पहुंची, जहां तिलक समारोह आयोजित हुआ। इसके बाद यात्रा तिलक रोड एवं आनंद चौक होते हुए वापस जैन धर्मशाला पहुंचकर संपन्न हुई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के साथ गणमान्य लोग मौजूद रहे।
 

pooja Singh

Share
Published by
pooja Singh

Recent Posts

उत्तराखंड में कुदरत का कहर: उफान पर गंगा और अलकनंदा, 132 सड़कें बंद, 5 जिलों में येलो अलर्ट जारी

देहरादून: उत्तराखंड में मानसून की प्रचंड बारिश ने जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है।…

11 minutes ago

जिलाधिकारी की अध्यक्षता में आयोजित हुई वन भूमि हस्तांतरण की बैठक

जिलाधिकारी ने लंबित प्रकरणों में तेजी, समयबद्ध फॉलोअप और विभागीय समन्वय सुनिश्चित करने के दिए…

32 minutes ago

देवप्रयाग-पौड़ी मार्ग पर दर्दनाक हादसा, 250 मीटर गहरी खाई में गिरी बोलेरो, 5 की मौत

एक गंभीर घायल टिहरी। टिहरी जिले के देवप्रयाग-पौड़ी मार्ग पर एक दर्दनाक सड़क हादसे में…

53 minutes ago

उत्तराखंड में ITI होंगे अपग्रेड, उद्योगों की जरूरत के मुताबिक मिलेगा कौशल प्रशिक्षण

मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन ने कौशल विकास एवं रोजगार से संबंधित योजनाओं की समीक्षा की …

1 hour ago

खेल महाकुंभ 2026- 01 सितंबर से सजेगा मुख्यमंत्री चौम्पियनशिप ट्रॉफी का मंच

न्याय पंचायत से राज्य स्तर तक होगा प्रतिभा का प्रदर्शन जिलाधिकारी ने दिए समयबद्ध तैयारियों…

2 hours ago