देहरादून: उत्तराखंड के जंगलों में दावानल यानी जंगल की आग का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। भीषण गर्मी, बढ़ते तापमान, सूखे जंगल और लापरवाही के चलते प्रदेश के कई हिस्सों में आग तेजी से फैल रही है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब तक 331 हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र जलकर राख हो चुका है, जबकि आग की चपेट में आने से तीन लोगों की मौत भी हो गई है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिला चमोली बताया जा रहा है।
उत्तराखंड के जंगल सिर्फ पहाड़ों की हरियाली का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उत्तर भारत की नदियों, स्वच्छ हवा और करोड़ों वन्यजीवों के लिए जीवनरेखा माने जाते हैं। ऐसे में जंगलों में लगातार बढ़ रही आग पर्यावरण और जैव विविधता के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है।
394 घटनाओं ने बढ़ाई चिंतावन विभाग के मुताबिक प्रदेश में चल रहे फायर सीजन के दौरान अब तक जंगल में आग लगने की 394 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। इन घटनाओं में 331 हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। गढ़वाल मंडल सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र बनकर सामने आया है। यहां आग लगने के 285 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 241.3 हेक्टेयर जंगल जल गया। वहीं कुमाऊं मंडल में आग की 74 घटनाएं सामने आईं, जिनमें 64.05 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ। इसके अलावा वन्यजीव क्षेत्रों में आग की 35 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 25.75 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर प्रभावित हुआ है।
चमोली सबसे ज्यादा प्रभावित जिलाप्रदेश में चमोली जिला जंगल की आग से सबसे ज्यादा प्रभावित बताया जा रहा है। लगातार लग रही आग के कारण कई वन क्षेत्रों में धुआं और आग की लपटें दूर तक दिखाई दे रही हैं। आग के चलते वन्यजीवों और ग्रामीण इलाकों पर भी खतरा बढ़ गया है। वन विभाग की टीमें लगातार आग बुझाने में जुटी हैं, लेकिन पहाड़ी इलाकों और तेज हवाओं के कारण आग पर काबू पाना चुनौती बना हुआ है।
आग की चपेट में आने से महिला की मौतचमोली जिले के गोपेश्वर क्षेत्र में जंगल की आग ने एक महिला की जान ले ली। जानकारी के मुताबिक आदिबद्री के पास बदाण गाड़ के जंगलों में लगी आग की चपेट में आने से 52 वर्षीय सुरेशी देवी की झुलसकर मौत हो गई। बताया गया कि मंगलवार शाम वह गायों को चारा देने और दूध निकालने के लिए गोशाला जा रही थीं। इसी दौरान जंगल में फैली आग उनकी तरफ बढ़ गई और वह उसकी चपेट में आ गईं। इस घटना के बाद इलाके में शोक का माहौल है।
चीड़ के जंगलों से तेजी से फैल रही आगविशेषज्ञों के अनुसार उत्तराखंड में जंगलों की आग फैलने की सबसे बड़ी वजह चीड़ के जंगल हैं। प्रदेश में करीब 25,138 वर्ग किलोमीटर सुरक्षित वन क्षेत्र है, जिसमें लगभग 3890 वर्ग किलोमीटर हिस्सा चीड़ के जंगलों का है। चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियां बेहद ज्वलनशील होती हैं और आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं। गर्मियों में थोड़ी सी चिंगारी भी बड़े दावानल का रूप ले लेती है।
कई इलाकों में धुएं जैसे हालातजंगलों में लगातार लग रही आग का असर अब पहाड़ी कस्बों में भी दिखाई देने लगा है। कई इलाकों में दोपहर के समय धुएं और धुंध जैसे हालात बन रहे हैं। इससे लोगों को सांस लेने में दिक्कत और आंखों में जलन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते आग पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो इसका असर जल स्रोतों, वन्यजीवों और पर्यटन पर भी पड़ सकता है।
प्रशासन और वन विभाग अलर्ट मोड परवन विभाग और प्रशासन ने आग प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है। स्थानीय लोगों से भी जंगलों में आग न लगाने और किसी भी घटना की सूचना तुरंत प्रशासन को देने की अपील की गई है। सरकार का कहना है कि जंगलों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त टीमें तैनात की जा रही हैं और संवेदनशील इलाकों में लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है।
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