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उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलें दे रहीं बड़े खतरे के संकेत, आंकड़े कर देंगे हैरान – Uttarakhand

इस खबर को शेयर करेंLatest posts by Sandeep Chaudhary (see all)नई दिल्ली .उत्तरकाशी के धराली में खीर गंगा नदी में अचानक आए सैलाब से मची तबाही के मंजर ने 2013 की केदारनाथ आपदा की यादें ताजा कर दी हैं। केदारनाथ में आई जल प्रलय 2004 की सुनामी के बाद भारत की सबसे भीषण त्रासदी थी। धराली में जल प्रलय का दृश्य देखने के बाद केदारनाथ आपदा के प्रभाविता का कहना है कि केदारनाथ में भी ऐसी ही घटना हुई थी। इस त्रासदी पर विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य के ऊंचाई वाले इलाकों में हुए बदलाव आगाह कर रहे हैं। ग्लेशियर झीलें खतरे और निचले इलाकों पर जोखिम का संकेत दे रही हैं।धराली आपदा चमोली जल प्रलय जैसीविशेषज्ञों का कहना है कि धराली में आई आपदा बहुत हद तक 2021 की चमोली त्रासदी से मेल खाती है। एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वाईपी सुंदरियाल ने कहा कि धराली में आई आपदा चमोली के समान है। बारिश तो महज एक फैक्टर है। हमें अधिक जानकारी जुटाने के लिए हाई रेजोल्यूशन वाले उपग्रह डेटा या जमीनी अध्ययन की जरूरत है।ग्लेशियर झीलें बन रहीं बड़ा जोखिमविशेषज्ञों का कहना है कि खतरा भारी बारिश या भूस्खलन तक ही सीमित नहीं है। हिमालय पर जलवायु परिवर्तन की भी तगड़ी मार पड़ी है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमनद झीलों यानी ग्लेशियर झीलों के रूप में नए खतरे पैदा हो रहे हैं। ये हिमनद झीलें बड़ी तबाही के संकेत दे रही हैं, क्योंकि इनके फटने से बड़ी तबाही मचती है।उत्तराखंड में 1,260 से अधिक ग्लेशियर झीलेंउत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। उत्तराखंड में 1,260 से अधिक हिमनद झीलें हैं, जिनमें से 13 को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झील और पांच को बेहद खतरनाक हिमनद झील के रूप में बांटा है। ये झीलें निचले इलाकों के लिए बड़ा खतरा पैदा करती हैं। खासकर ऐसे वक्त में जब तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगते हैं।वाडिया भूविज्ञान संस्थान ने बार-बार किया आगाहवाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (डब्ल्यूएचजी) ने ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ और हिमनद झीलों से उत्पन्न खतरों के बारे में बार-बार आगाह किया है। चमोली आपदा के बाद वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर को अस्थिर करने में ‘फ्रीज-थॉ साइकल’ (बर्फ के जमने और पिघलने का चक्र) की भूमिका पर प्रकाश डाला है।ऐसे होता है इनका निर्माणहिमनद झील ग्लेशियर पिघलने की से बनती है। ये झीलें आमतौर पर ग्लेशियर के तल पर, उसके ऊपर या उसके अंदर या नीचे बन सकती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण इन झीलों में पानी की मात्रा बढ़ने लगती है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमनद झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ पर साल 2020 के दिशा-निर्देशों में उच्च जोखिम वाली झीलों की पहचान, भूमि-उपयोग प्रतिबंधों को लागू करने के साथ निगरानी प्रणाली पर जोर दिया है।ग्लेशियर झील टूटना भी हो सकता है वजहएनडीटीवी इंडिया की उत्तराखंड की दून यूनिवर्सिटी में भूविज्ञान के विजिटिंग प्रोफेसर एवं भूगर्भ वैज्ञानिक डीडी चुनियाल उत्तरकाशी में हुए हादसे के बारे में कहते हैं कि ऐसा हो सकता है कि भारी बारिश से ग्लेशियर तालाबों या झील में जलस्तर बढ़ गया हो। इनमें से कोई एक या ज्‍यादा तालाब टूट गए होंगे जिससे उत्तरकाशी के धराली में तबाही मची। उनका यह भी कहना है कि धराली गांव के ऊपर पहाड़ों पर खीर गंगा नदी के कैचमेंट इलाके में ग्लेशियर तालाबों की एक सिरीज मौजूद है।2010 के बाद से बढ़ी बारिश की घटनाएं‘जर्नल ऑफ जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया’ में पिछले महीने प्रकाशित एक अध्ययन उत्तराखंड में 2010 के बाद भारी बारिश और सतह पर सैलाब आने की घटनाओं में बढोतरी की तस्दीक करता है। प्रोफेसर सुंदरियाल के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन से पता चलता है कि 2010 के बाद उत्तराखंड के मध्य एवं पश्चिमी हिस्से अत्यधिक बारिश की घटनाओं के गवाह बने। माना जा रहा है कि भारी बारिश या बादल फटने की दशा में ग्लेशियर झीलों का अचानक टूटना बड़ी तबाही की वजह बनता है।केदारनाथ में भी हुई थी ऐसी ही जल प्रलयविशेषज्ञों की मानें तो केदारनाथ में 2013 में आई आपदा मानसूनी बारिश में तेज बढ़ोतरी और पश्चिमी विक्षोभ के संयुक्त प्रभाव का नतीजा थी। इसके कारण 24 घंटे की अवधि में 300 मिलीमीटर से अधिक बारिश हुई थी। अत्यधिक बारिश और तेजी से पिघलती बर्फ के कारण चोराबारी झील का मोराइन बांध टूट गया जिसके बाद क्षेत्र में भीषण बाढ़ आने से लगभग 5,700 लोगों की मौत हो गई थी।चमोली में टूटा था ‘हैंगिंग ग्लेशियर’इससे पहले फरवरी 2021 में एक ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ के टूटने के कारण चमोली जिले में ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों में अचानक बाढ़ आ गई थी। इस जल प्रलय में दो प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं-ऋषिगंगा और तपोवन विष्णुगाड-को भारी नुकसान पहुंचा था। इस जल प्रलय की चपेट में आकर बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। प्रभावित क्षेत्रों से 80 लाशें बरामद की गई थीं जबकि 204 लोग लापता हो गए थे।

Nandni sharma

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