उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अंकिता भंडारी हत्या मामले से संबंधित ऑडियो-वीडियो विवाद में भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर को महत्वपूर्ण अंतरिम राहत प्रदान की है। अदालत ने हरिद्वार और देहरादून जिलों में दायर दो अतिरिक्त मुकदमों में उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। इससे पूर्व मंगलवार को दो अन्य मामलों में इसी प्रकार का आदेश जारी किया गया था। नवीनतम निर्णय के साथ अब उनके विरुद्ध दर्ज सभी चार एफआईआर में उच्च न्यायालय द्वारा गिरफ्तारी पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
बुधवार को न्यायाधीश आशीष नैथानी की एकल पीठ ने सुरेश राठौर की अपील पर विचार करते हुए यह फैसला सुनाया। अपील में दावा किया गया कि उन्होंने सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की गलत सूचना नहीं फैलाई है और न ही भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाने की कोई कोशिश की गई। इसलिए, उनके खिलाफ दर्ज मामले आधारहीन हैं और गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भेजते हुए चार सप्ताह में उत्तर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इस अवधि तक पूर्व विधायक के खिलाफ कोई भी कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा। गिरफ्तारी पर रोक के बाद अब सुरेश राठौर सार्वजनिक रूप से उपस्थित हो सकेंगे। अब तक वे लापता थे, जिससे जांच अधिकारियों के समक्ष कठिनाई उत्पन्न हो रही थी।
सभी चार मुकदमों का संक्षिप्त ब्योरा
1. झबरेड़ा पुलिस स्टेशन, हरिद्वार
शिकायतकर्ता धर्मेंद्र कुमार ने आरोप लगाया कि सुरेश राठौर और उनकी कथित जीवनसाथी उर्मिला सोनावर ने फेसबुक जैसे प्लेटफार्मों पर ऑडियो-वीडियो प्रसारित कर दुष्यंत कुमार गौतम की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया। पुलिस ने इसे अपमानजनक और गलत प्रचार का मामला मानते हुए प्राथमिकी दर्ज की।
2. बहादराबाद पुलिस स्टेशन, हरिद्वार
यह प्राथमिकी भी समान आरोपों पर आधारित है। शिकायत में उल्लेख किया गया कि प्रसारित सामग्री के माध्यम से अंकिता भंडारी हत्या प्रकरण से जोड़कर एक प्रमुख भाजपा पदाधिकारी की छवि को जानबूझकर कलंकित करने की कोशिश की गई। इस मामले में भी उच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी पर प्रतिबंध लगा दिया है।
3. नेहरू कॉलोनी पुलिस स्टेशन, देहरादून
इस प्राथमिकी में दावा है कि सोशल मीडिया पर फैलाई गई ऑडियो-वीडियो सामग्री से राजनीतिक साजिश के तहत भ्रामक विवरण फैलाए गए। शिकायतकर्ता के अनुसार, इससे न केवल एक विशिष्ट व्यक्ति बल्कि राज्य की राजनीतिक व्यवस्था में भी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई।
4. डालनवाला पुलिस स्टेशन, देहरादून
यह मामला भी सोशल मीडिया पर वायरल की गई सामग्री से जुड़ा है। शिकायत में कहा गया कि बिना किसी ठोस साक्ष्य के दुष्यंत गौतम को अंकिता भंडारी घटना से जोड़ने का प्रयास किया गया, जिससे उनकी सामाजिक तथा राजनीतिक छवि को हानि पहुंची। यह प्राथमिकी स्वयं दुष्यंत गौतम द्वारा दर्ज कराई गई है।
न्यायालय का दृष्टिकोण
उच्च न्यायालय ने प्रारंभिक रूप से स्वीकार किया कि सभी मामलों में आरोपों की प्रकृति समान है और याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से बचाव प्रदान करना न्यायोचित है। अब चारों प्रकरणों में राज्य सरकार तथा शिकायतकर्ताओं के उत्तर के पश्चात आगे की कार्यवाही होगी। यह घटनाक्रम न केवल अंकिता भंडारी हत्या विवाद को पुनः सुर्खियों में ला रहा है, बल्कि सोशल मीडिया पर लगाए जाने वाले दावों तथा उनकी कानूनी मर्यादाओं पर गहन विमर्श को प्रेरित कर रहा है।
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