जोशीमठ में ऐतिहासिक तिमुण्डया मेले की गूंज, धार्मिक अनुष्ठानों के साथ समापन – my uttarakhand news

 
चमोली ( प्रदीप लखेड़ा )
ज्योतिर्मठ के नरसिंह प्रांगण में तिमुण्डया मेला आयोजित हुआ। हर वर्ष भगवान बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से पूर्व वीर तिमुण्डया मेला 1 या 2 सप्ताह पूर्व शनिवार को होता है। पिछले 2 वर्षों से तिमुण्डया मेला सिर्फ सांकेतिक रूप से हुआ क्योंकि तिमुण्डया वीर के पाश्वा का आकस्मिक निधन हो गया था। तिमुण्डया मेले में वीर तिमुण्डया से सुखद और सुगम चारधाम यात्रा की कामना की जाती है।
मेले के दिन नृसिंह मंदिर में देव पूजाई समिति के कार्यालय से देव पूजाई समिति के पदाधिकारियों और पश्चाओं को ढोल-दमाऊ के साथ नृसिंह मंदिर प्रांगण ले जाया जाता है, फिर नृसिंह मंदिर प्रांगण से माँ नवदुर्गा का लाठ लाया जाता है। जिस पर माँ नवदुर्गा की शक्ति रहती है उसको नृसिंह मंदिर प्रांगण में लाया जाता है और नवदुर्गा, भुवनेश्वरी, चण्डिका, दाणी देवता और तिमुण्डया का पश्वा उस माँ नवदुर्गा का लाठ पकड़कर अवतरित होते है।
सभी देवी-देवता गंगाजल से स्नान करते है, फिर तिमुण्डया वीर अवतरित होता है और फिर शुरू होता है तिमुण्डया का रौद्र रूप। तिमुण्डया का वीर 1 बकरी, 40 किलो का कच्चा चावल, 10 किलो गुड़, 2 घड़े पानी सबके सामने पीता है। श्रद्धालु यह देख दंग रह जाते हैं और इस मेले को देखने के लिये हर साल सैकड़ों श्रद्धालु आते है। भारी भीड़ को देखते हुए ज्यादातर इस मेले का कार्यक्रम गुप्त ही रखा जाता है।
माना जाता है कि तिमुण्डया तीन सिर वाला वीर था और एक सिर से दिशा का अवलोकन, एक सिर से मांस खाना और एक सिर से वेदों का अध्ययन करता था ह्यूना के जगलों में इस राक्षस ने बड़ा आतंक मचा रखा था और हर दिन मनुष्य को खाता था। एक दिन माँ दुर्गा देवयात्रा पर थी। गांव वाले माँ के स्वागत के लिये नहीं आये, पूछने पर पता चला की लोग तिमुण्डया राक्षस के डर से घर से बाहर नहीं निकल रहे है और वो हर दिन एक मनुष्य को खाता है। हर दिन एक मनुष्य नरबलि के लिये जाता है। माँ दुर्गा के कहने पर उस दिन कोई नहीं जाता है, तो क्रोधित तिमुण्डया गर्जना करते हुये गांव में पहुँचता है। माँ नवदुर्गा और तिमुण्डया का भयंकर युद्ध होता है। माँ नवदुर्गा उसके तीन में से दो सर काट देती है। एक सिर कटकर सेलंग गांव के आसपास गिरता है उसे पटपटवा वीर और एक उर्गम के पास हिस्वा राक्षस कहते है और ज्यो ही नवदुर्गा माँ तिमुण्डया का तीसरा सिर काटने लगती है तो तिमुण्डया राक्षस माँ के शरणागत हो जाता है और माँ उसकी वीरता से बहुत प्रसन्न होती है और उसे अपना वीर बना देती है और आदेश देती है, आज से वो मनुष्य का भक्षण नहीं करेगा। साल में एक बार उसे एक पशु बकरी की बलि और अन्य खाना दिया जायेगा, तब से ये परम्परा चली आ रही है।
इस अवसर पर बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के उपाध्यक्ष ऋषि प्रसाद सती, देव पूजाई समिति के अध्यक्ष, देव पूजाई समिति के सभी पदाधिकारी, मंदिर समिति के अधिकारी एवं कर्मचारी के साथ ही भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

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