उत्‍तराखंड में छ‍िपा है 52 करोड़ साल पुराना राज, पता चलते ही खुलेगा पूर्वजों का रहस्‍य, पहुंच गए एक्सपर्ट – Uttarakhand

इस खबर को शेयर करेंLatest posts by Sandeep Chaudhary (see all)देहरादूनः लखनऊ स्थित बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के दो प्रमुख वैज्ञानिक, डॉ. हुकम सिंह और डॉ. रणवीर सिंह नेगी, इन दिनों उत्तराखंड के नीति-मलारी-सुमना क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक अध्ययन में लगे हुए हैं. उनका मुख्य लक्ष्य गढ़वाल हिमालय में उन शैल-संरचनाओं की खोज करना है, जिनमें लगभग 520-510 मिलियन वर्ष पुराने समुद्री जीवन के जीवाश्म संरक्षित हैं. ये जीवाश्म कैंब्रियन काल के हैं, जो पृथ्वी के इतिहास में जीवन के शुरुआती विकास का एक महत्वपूर्ण चरण था.यह दूरस्थ क्षेत्र तैथ्यन हिमालय का हिस्सा है, जो करोड़ों साल पहले एक विशाल और प्राचीन तैथिस महासागर की तलहटी हुआ करता था. यह महासागर अब भले ही लुप्त हो चुका हो, लेकिन उसकी कहानियाँ आज भी इन चट्टानों के माध्यम से सामने आती हैं. BSIP के वैज्ञानिक इन तलछटी अनुक्रमों का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं, ताकि भारतीय उपमहाद्वीप में समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के प्रारंभिक विकास को बेहतर ढंग से समझा जा सके.छात्राओं से एक्सपर्ट की बातचीतविश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) के अवसर पर, डॉ. सिंह और डॉ. नेगी ने पीएम श्री राजकीय आदर्श बालिका इंटर कॉलेज, ज्योतिर्मठ का भी दौरा किया. यहां उन्होंने प्रभारी प्रधानाचार्य श्रीमती तारा राणा, समस्त शिक्षिकाओं और छात्राओं के साथ एक विशेष इंटरैक्टिव सत्र आयोजित किया. इस सत्र का उद्देश्य छात्राओं में पृथ्वी के अतीत और उसके भविष्य को सुरक्षित रखने के महत्व के प्रति जिज्ञासा जगाना था. कार्यक्रम की मुख्य विशेषता जीवाश्मों की प्रत्यक्ष प्रदर्शनी थी, जिसमें छात्राओं को निम्नलिखितयह प्लियो-प्लीस्टोसीन काल (लगभग 30-10 लाख वर्ष पूर्व) की है और झारखंड से लाई गई थी. इसे आधुनिक नीलगिरी (यूकेलिप्टस) की ताजी लकड़ी के साथ प्रदर्शित किया गया, ताकि यह बताया जा सके कि समय के साथ जीवन की कहानी जीवाश्मों में कैसे संरक्षित होती है. यह वैज्ञानिक अभियान न केवल पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने में मदद करेगा, बल्कि युवा पीढ़ी में वैज्ञानिक सोच और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता भी बढ़ाएगा. 

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