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उत्तराखंड में चुनाव अधिकारी कार्यालय की एक अपील से क्यों परेशान हुए सर्विस वोटर, जानिए – myuttarakhandnews.com

नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वोटर लिस्ट के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी एसआईआर का आदेश दिया था. बिहार में एसआईआर और चुनाव के बाद यह प्रक्रिया अभी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल ही रही है. अब चुनाव आयोग उत्तराखंड में भी जल्द ही एसआईआर कराने की तैयारी में है.
उत्तराखंड में एसआईआर की आहट से ही लगभग एक लाख फौजी मतदाता परेशान हो गए हैं. उत्तराखंड के फौजी मतदाताओं के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया है. धर्मसंकट ये कि ड्यूटी करते हुए सर्विस वोटर रहें या अपने गांव के सामान्य वोटर. चुनाव आयोग जल्दी ही उत्तराखंड में एसआईआर शुरू करने जा रहा है. ऐसे में अब इनके सामने विकल्प यही है कि ये फौजी और इनके परिजन इन दो में से कोई एक विकल्प चुनें.
उत्तराखंड के निर्वाचन कार्यालय ने सर्विस वोटर्स से दो में से किसी एक पंजीकरण का चयन करने की अपील की है. राज्य की सामान्य सूची या उनकी सेवा-आधारित सूची में से एक का उपयोग करें और दूसरे को हटाने की प्रक्रिया शुरू करें. उत्तराखंड निर्वाचन कार्यालय के अनुसार, किसी विशिष्ट गांव या शहर में अपना वोट बरकरार रखने के इच्छुक किसी भी मतदाता को समर्पित पोर्टल के माध्यम से से सर्विस वोटर लिस्ट से अपना नाम हटाने के लिए औपचारिक रूप से अनुरोध करना होगा.
जिन आम मतदाताओं के नाम शहरी और ग्रामीण, दोनों ही मतदाता सूची में शामिल हैं, उनको भी एक जगह से अपना नाम हटवाना होगा. उत्तराखंड मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय चुनावी डेटाबेस सुरक्षित करने के लिए एसआईआर की तैयारी में जुट गया है. जनवरी, 2025 में जारी आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में 89 हजार 812 सर्विस वोटर पंजीकृत हैं. इनमें 87 हजार 103 पुरुष और 2709 महिलाएं शामिल हैं. सर्विस वोटर के तौर पर पंजीकृत ये लोग मुख्य रूप से सेना या फिर अर्धसैनिक बलों में कार्यरत हैं. नियमों के मुताबिक इन व्यक्तियों का पंजीकरण उनकी सेवा के स्थान के आधार पर किया गया है.
गौरतलब है कि जनवरी में प्रकाशित उत्तराखंड की मतदाता सूची में कुल 84 लाख 29 हजार 459 वोटर्स के नाम दर्ज हैं, इनमें 43 लाख 64 हजार 667 पुरुष, 40 लाख 64 हजार 488 महिलाएं और 304 थर्ड जेंडर के वोटर शामिल हैं. मतदाताओं में एक आम भ्रम यह है कि गांव की सूची से अपना नाम हटवाने की स्थिति में वे स्थानीय चुनावों में भाग लेने के लिए अयोग्य हो जाएंगे.

Nandni sharma

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