मौलाना अब्दुल लतीफ बाइज्जत बरी, साक्ष्यों के अभाव में अदालत का बड़ा फैसला – myuttarakhandnews.com

जोशीमठ। करीब पांच वर्ष पुराने बदरीनाथ धाम से जुड़े कथित विवादित बयान के मामले में जोशीमठ की अदालत ने मौलाना अब्दुल लतीफ को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है। साक्ष्यों के अभाव और अभियोजन पक्ष द्वारा ठोस तकनीकी प्रमाण प्रस्तुत न किए जाने के चलते न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अनिल कुमार कोरी की अदालत ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
अदालत ने 30 जनवरी 2026 को खुली अदालत में फौजदारी वाद संख्या 80/2023 में निर्णय सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए और 295ए के तहत लगाए गए आरोपों को सिद्ध करने में असफल रहा। इसके साथ ही अदालत ने मौलाना अब्दुल लतीफ के पूर्व में दाखिल व्यक्तिगत बंधपत्र और जमानतनामे भी निरस्त कर दिए।
क्या था पूरा मामला
गौरतलब है कि यह मामला 26 जुलाई 2021 को सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो से जुड़ा था। आरोप था कि वीडियो में मौलाना अब्दुल लतीफ ने अपने कथित भाषण के दौरान हिंदुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र बदरीनाथ धाम को ‘बदरुद्दीन शाह’ बताया और उसे मुसलमानों का स्थान बताते हुए सौंपे जाने की बात कही।
वीडियो वायरल होने के बाद धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने का आरोप लगाते हुए बदरीनाथ थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया था। पुलिस जांच के बाद 21 अगस्त 2023 को आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया गया।
तकनीकी साक्ष्य साबित नहीं कर पाया अभियोजन पक्ष
मामले की सुनवाई के दौरान 11 नवंबर 2024 को साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, लेकिन अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह सिद्ध नहीं कर सका कि संबंधित वीडियो किस आईपी एड्रेस से, किस तारीख और किस समय अपलोड किया गया था। साथ ही यूट्यूब या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से वीडियो के स्रोत और उसकी प्रामाणिकता से संबंधित कोई ठोस प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
अदालत की टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल वायरल वीडियो के आधार पर, बिना पुख्ता डिजिटल और तकनीकी साक्ष्यों के, किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। तकनीकी साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से मुक्त किया जाता है।
कानूनी दृष्टिकोण से अहम फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला डिजिटल साक्ष्यों की प्रमाणिकता और तकनीकी जांच की अहमियत को रेखांकित करता है। साथ ही यह स्पष्ट करता है कि केवल सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री के आधार पर बिना ठोस जांच के किसी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।

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pooja Singh

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