देहरादून, । दून घाटी के इतिहास, पुरातत्व, सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और प्राकृतिक भू-दृश्य को दस्तावेजी रूप देने की दिशा में शुरू की गई शोध पहल ‘Memoirs of Doon: The First Chapter—A Valley Remembered, Researched and Reimagined’ का समापन समारोह बुधवार को दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित किया गया। स्नेहा सोसाइटी फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट की ओर से आयोजित कार्यक्रम में पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, शिक्षाविदों, मार्गदर्शकों और विरासत प्रेमियों ने दून की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर पर मंथन किया।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), देहरादून सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. मोहन चंद्र जोशी रहे। उन्होंने दून घाटी और उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे पुरातात्विक कार्यों पर विशेष प्रस्तुति दी। उन्होंने कहा कि लगातार हो रहे सर्वेक्षण, अन्वेषण और उत्खनन से अतीत से जुड़े नए प्रमाण सामने आ रहे हैं, जिससे उत्तराखंड के इतिहास को समझने में मदद मिल रही है।डॉ. जोशी ने उत्तराखंड में मौजूद व्यापक पुरातात्विक संभावनाओं का उल्लेख करते हुए व्यवस्थित सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण, शोध और संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आम लोगों में पुरातत्व एवं इतिहास के प्रति रुचि बढ़ाने वाले प्रयासों की सराहना भी की।विद्यार्थियों को शोध से जोड़ने की पहलकार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों और प्रतिभागियों के स्वागत से हुई। स्नेहा सोसाइटी फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट की अध्यक्ष डॉ. शक्तिबाला और उपाध्यक्ष सूरत सिंह कंडारी ने संस्था तथा ‘Memoirs of Doon’ पहल की पृष्ठभूमि और उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संस्था स्व-वित्तपोषित आधार पर जमीनी स्तर पर गुणवत्तापूर्ण कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध है।संस्था के संयुक्त सचिव हेमंत वर्मा ने सस्टेनेबल डेवलपमेंट, शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक सरोकारों से जुड़े संस्था के कार्यों की जानकारी दी।परियोजना के समन्वयक सोहम दत्ता ने मुख्य प्रस्तुति में पहले चरण की अवधारणा, शोध पद्धति, फील्डवर्क और प्रमुख निष्कर्षों को साझा किया। उन्होंने बताया कि इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल कक्षा तक सीमित रखने के बजाय उन्हें अपने आसपास के इतिहास, पुरातत्व, भू-दृश्य, दृश्य संस्कृति और जीवंत परंपराओं से सीधे जोड़ना है।शोध के दौरान विद्यार्थियों ने फील्ड ऑब्जर्वेशन, फोटोग्राफी, अभिलेखीय दस्तावेज, ऐतिहासिक मानचित्र, भौतिक संस्कृति और मौखिक इतिहास जैसे विभिन्न स्रोतों का इस्तेमाल किया। परियोजना का मानना रहा कि इतिहास को समझने के लिए किसी एक स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग प्रमाणों को आपस में जोड़कर देखना जरूरी है।दून घाटी को एक जुड़े हुए ऐतिहासिक भू-दृश्य के रूप में देखापरियोजना के तहत पश्चिमी दून के पछवा दून से लेकर मध्य दून और पूर्वी दून तक विभिन्न क्षेत्रों में फील्डवर्क किया गया। नदी घाटियों, गांवों, धार्मिक स्थलों, नहर प्रणालियों, पुरातात्विक अवशेषों, जंगलों और तेजी से बदलते शहरी क्षेत्रों का अध्ययन किया गया।पछवा दून के कालसी, जगतग्राम, हरिपुर और पृथ्वीपुर जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया। शोधकर्ताओं ने इन स्थानों को अलग-अलग ऐतिहासिक स्थलों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक सांस्कृतिक गलियारे के रूप में समझने का प्रयास किया, जहां आवागमन, बसावट, राजनीतिक सत्ता, धार्मिक गतिविधियों और दृश्य संस्कृति की विभिन्न परतें मौजूद रही हैं।पृथ्वीपुर सहित अन्य क्षेत्रों में मिले स्थापत्य और मूर्तिकला संबंधी अवशेषों ने दून घाटी के प्रारंभिक मध्यकालीन और मध्यकालीन इतिहास के नए पहलुओं पर शोध की संभावनाएं भी सामने रखी हैं। परियोजना के अनुसार दून का पुरातात्विक परिदृश्य केवल संरक्षित स्मारकों तक सीमित नहीं है।स्मारकों से आगे इतिहास की खोज‘Memoirs of Doon’ का दायरा केवल पुरातत्व तक सीमित नहीं रहा। इसमें घाटी की जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं, मौखिक इतिहास, नदियों, नहरों और बदलते भू-दृश्य का भी अध्ययन किया गया।खेड़ी मान सिंह में पांडव नृत्य और पांडव जागर जैसी जीवंत परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया गया। शोधकर्ताओं ने यह समझने का प्रयास किया कि किस तरह लोक महाकाव्य गांवों के अनुष्ठान, संगीत, भौतिक संस्कृति, सामूहिक स्मृति और सामुदायिक सहभागिता का हिस्सा बनते हैं।ऐतिहासिक मानचित्रों, बदलते स्थान-नामों और पलायन से जुड़ी मौखिक कथाओं को भी एक साथ रखकर अध्ययन किया गया। वहीं ऐतिहासिक नहर प्रणालियों, नदियों और भू-आकृतिक संरचनाओं को भी अध्ययन का हिस्सा बनाया गया। परियोजना ने इस बात पर जोर दिया कि भू-दृश्य इतिहास का केवल मंच नहीं, बल्कि उसे आकार देने वाला महत्वपूर्ण कारक भी है।शोध को चार प्रमुख विषयों में व्यवस्थित किया गया—इतिहास, पुरातत्व एवं दृश्य संस्कृति; धर्म, अनुष्ठान एवं सांस्कृतिक परंपराएं; भौगोलिक भू-दृश्य; तथा मौखिक इतिहास एवं समुदाय।‘पूरी घाटी ही एक अभिलेखागार है’परियोजना से उभरने वाली प्रमुख अवधारणाओं में यह विचार सामने आया कि दून के इतिहास को किसी एक अभिलेख या एक विषय के माध्यम से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। पुराने मानचित्र, पुरातात्विक अवशेष, मंदिरों की दीवारें, नहरें, नदियां, गांवों के नाम, धार्मिक परंपराएं और समुदायों की स्मृतियां—सभी अतीत की अलग-अलग परतों को संजोए हुए हैं।इसी आधार पर परियोजना ने यह विचार सामने रखा कि ‘पूरी घाटी ही एक अभिलेखागार है।’ यानी दून का भू-दृश्य अपने भीतर इतिहास की अनेक परतों को समेटे हुए है, जिन्हें दस्तावेजीकृत, परखा और सावधानीपूर्वक समझने की आवश्यकता है।युवा शोधकर्ताओं का हुआ सम्मानसमापन समारोह में ‘Memoirs of Doon’ के पहले चरण से जुड़े इंटर्न और युवा शोधकर्ताओं के योगदान को भी सम्मानित किया गया। उन्हें प्रमाणपत्र और स्टाइपेंड प्रदान किए गए। शोधार्थियों को फील्डवर्क, दस्तावेजीकरण, शोध और लेखन में योगदान के लिए सराहा गया।दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के सी.के. तिवारी ने समापन संबोधन में दून घाटी की विरासत को दस्तावेजीकृत करने की दिशा में स्नेहा सोसाइटी की पहल की सराहना की। कार्यक्रम का समापन स्नेहा सोसाइटी फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के उपाध्यक्ष सूरत सिंह कंडारी के आभार ज्ञापन के साथ हुआ।दून से पूरे उत्तराखंड तक विस्तार की तैयारीआयोजकों ने कहा कि ‘Memoirs of Doon: The First Chapter’ को किसी अभियान का अंत नहीं, बल्कि एक व्यापक शोध यात्रा की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। दून घाटी को पायलट क्षेत्र के रूप में लेकर विद्यार्थियों और युवा शोधकर्ताओं के लिए फील्डवर्क, अंतरविषयक शोध और दस्तावेजीकरण का मॉडल विकसित किया गया है।आने वाले चरणों में पुरातात्विक दस्तावेजीकरण को विस्तार देने, मौखिक इतिहास के कार्य को आगे बढ़ाने, ऐतिहासिक नहर एवं नदी प्रणालियों पर शोध करने और कम अध्ययन किए गए धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों का दस्तावेजीकरण करने की योजना है।इस पहल का उद्देश्य उत्तराखंड के युवाओं को अपनी ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को देखने, समझने, सवाल करने और दस्तावेजीकृत करने के लिए प्रोत्साहित करना है। परियोजना से जुड़े शोधकर्ताओं के अनुसार, एक गांव की यात्रा फील्डवर्क, एक बातचीत मौखिक इतिहास, कोई तराशा हुआ पत्थर पुरातात्विक प्रमाण और एक पुरानी नहर पर्यावरण एवं सामाजिक इतिहास का स्रोत बन सकती है।‘Memoirs of Doon: The First Chapter’ इस तरह दून घाटी की विरासत को याद करने, शोध करने और नए दृष्टिकोण से समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है। इसका लक्ष्य आगे चलकर इसी मॉडल को उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों तक विस्तार देना है।
