नमामि गंगे मिशन से गंगा संरक्षण को मिली नई गति… 208 किमी लंबा सीवर नेटवर्क विकसित किया

नमामि गंगे मिशन के तहत उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन की दिशा में किए जा रहे प्रयास अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं। वर्षों तक योजनाओं और संकल्पों तक सीमित रही यह पहल आज ठोस ज़मीनी परिणामों के रूप में सामने आ रही है। राज्य में 1743 करोड़ रुपये की लागत से कुल 42 परियोजनाएं संचालित की गई हैं, जिनमें से 38 परियोजनाएं पूर्ण होकर कार्यशील हो चुकी हैं, जबकि शेष चार परियोजनाएं विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं।
इन परियोजनाओं के माध्यम से 208 किलोमीटर लंबा सीवर नेटवर्क विकसित किया गया है तथा 244 एमएलडी से अधिक की सीवेज शोधन क्षमता—निर्मित अथवा निर्माणाधीन—उपलब्ध कराई गई है। रियल-टाइम निगरानी प्रणालियां, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन, जैव विविधता संरक्षण और समुदाय आधारित पहलों ने मिलकर गंगा तटवर्ती शहरों में नदी के साथ जिम्मेदार और टिकाऊ सहअस्तित्व की नई मिसाल कायम की है।
गंगा किनारे बसे शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट जल प्रबंधन के लिए एक सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया गया है। नालों के इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन, सीवर नेटवर्क का विस्तार, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) का निर्माण एवं उन्नयन, तथा सेप्टेज को उपचार प्रणाली से जोड़ने जैसे ठोस कदमों ने वर्षों से चली आ रही अनियंत्रित अपशिष्ट जल निकासी को योजनाबद्ध, निगरानी-युक्त और उपचारित व्यवस्था में परिवर्तित कर दिया है।
आगामी अर्ध कुंभ को देखते हुए नमामि गंगे मिशन ने विशेष रूप से कमर कस ली है। श्रद्धालुओं की भारी संख्या और आस्था से जुड़े इस महापर्व के दौरान गंगा की पवित्रता और निर्मलता बनाए रखने के लिए सभी व्यवस्थाओं को सुदृढ़ किया गया है। सीवेज प्रबंधन, नालों का प्रभावी इंटरसेप्शन, रियल-टाइम जल गुणवत्ता निगरानी और उपचार संयंत्रों की सतत निगरानी के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि गंगा की धारा और अधिक पावन, अविरल और निर्मल बनी रहे।
राज्य की राजधानी देहरादून और धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा संरक्षण और शहरी स्वच्छता को सशक्त आधार देने के लिए बड़े पैमाने पर अवसंरचनात्मक विकास किया गया है। दोनों शहरों में 800 करोड़ रुपये की लागत से कुल 12 परियोजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं। इनके अंतर्गत 141 एमएलडी की सीवेज शोधन क्षमता विकसित की जानी है, जिसमें से 126 एमएलडी क्षमता पहले ही तैयार हो चुकी है। इसके साथ ही 72 किलोमीटर लंबे सीवरेज नेटवर्क का निर्माण कर अपशिष्ट जल को सुव्यवस्थित ढंग से उपचार संयंत्रों तक पहुंचाने की ठोस व्यवस्था की गई है।
योग, शांति और आस्था के वैश्विक केंद्र ऋषिकेश में नमामि गंगे मिशन के प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। बढ़ती आबादी और पर्यटन दबाव के बावजूद, शहर ने अपशिष्ट जल प्रबंधन की चुनौती को अवसर में बदला है। वर्तमान में ऋषिकेश में 58 एमएलडी की सुदृढ़ सीवेज शोधन क्षमता उपलब्ध है। संवेदनशील नदी तटीय क्षेत्रों में नालों का इंटरसेप्शन, आधुनिक एसटीपी और सेप्टेज सह-उपचार प्रणाली ने यह सुनिश्चित किया है कि गंगा में प्रवेश से पहले अपशिष्ट जल पूरी तरह उपचारित हो।
त्रिवेणी घाट जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में वर्ष 2015 से 1.02 किलोमीटर लंबे सीवर नेटवर्क के माध्यम से सीवरेज व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया है। इसके अतिरिक्त, इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन परियोजना के अंतर्गत 58 एमएलडी क्षमता का आधुनिक एसटीपी और 2.15 किलोमीटर लंबा सीवर एवं संवहन नेटवर्क विकसित किया गया, जो फरवरी 2022 में पूर्ण हुआ। इन प्रयासों ने ऋषिकेश को एक स्थायी और भरोसेमंद अपशिष्ट जल अवसंरचना प्रदान की है।
सेप्टिक टैंकों से निकलने वाले मल कीचड़ के सुरक्षित निपटान को सुनिश्चित करने के लिए सेप्टेज एवं सह-उपचार प्रणाली को भी प्रभावी रूप से एकीकृत किया गया है। ऋषिकेश को हरिद्वार, श्रीनगर और देवप्रयाग की उपचार सुविधाओं से जोड़ते हुए 50 केएलडी की सेप्टेज उपचार क्षमता विकसित की गई है, जो अक्टूबर 2025 में पूर्ण हुई। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि फीकल स्लज बिना उपचार के गंगा या उसकी सहायक नदियों में न पहुंचे।
इन सभी पहलों का प्रत्यक्ष प्रभाव अब ज़मीनी स्तर पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है। गंगा में प्रवाहित होने से पहले अपशिष्ट जल का प्रभावी इंटरसेप्शन, समर्पित उपचार संयंत्रों में शोधन और सेप्टेज का वैज्ञानिक उपचार सुनिश्चित हो रहा है। आगामी अर्ध कुंभ के मद्देनज़र की गई इन सुदृढ़ तैयारियों के परिणामस्वरूप गंगा की धारा और अधिक निर्मल, पावन और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का सजीव प्रतीक बनती जा रही है। नमामि गंगे मिशन के माध्यम से उत्तराखंड ने गंगा संरक्षण की दिशा में एक मजबूत, स्थायी और अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया है।

Sapna Rani

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