भारतीय प्रशासनिक तंत्र और न्यायशास्त्र के चौराहे पर आज एक ऐसा मामला खड़ा है, जिसने ‘खुफिया गोपनीयता’ और ‘लोकतांत्रिक जवाबदेही’ के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। AIIMS, दिल्ली के पूर्व मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) संजीव चतुर्वेदी और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के बीच का यह कानूनी संघर्ष अब केवल सूचना के अधिकार (RTI) तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संस्थागत युद्ध में तब्दील हो चुका है।मामले की शुरुआत वर्ष 2012 और 2014 के बीच, जब संजीव चतुर्वेदी एम्स में सीवीओ के रूप में कार्यरत थे, उन्होंने संस्थान के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर किया। जब एम्स के तत्कालीन निदेशक के कार्यालय में तैनात विशेष कार्य अधिकारी (OSD) पर आरोप लगे कि उन्होंने नियमों की अनदेखी कर अपने ही पुत्र और पुत्रवधू की फर्म ‘दृष्टि मेडिकोज एंड सर्जिकल’ को लाभ पहुँचाने के लिए कीटाणुनाशकों और फॉगिंग समाधानों की खरीद में हेरफेर कि गई । इन सामान्य वस्तुओं को जानबूझकर ‘प्रोपराइटी’ (एकाधिकार) मद घोषित किया गया ताकि खुली निविदा (Tender) से बचा जा सके, जबकि वे बाजार में बहुत कम कीमतों पर उपलब्ध थीं । सीबीआई ने अपनी प्रारंभिक जांच में अनियमितताओं की पुष्टि तो की, लेकिन अंततः इसे केवल “प्रशासनिक चूक” बताकर स्वास्थ्य मंत्रालय को वापस भेज दिया। चतुर्वेदी ने इस रिपोर्ट को “आधी-अधूरी” (Half-baked) करार देते हुए आरटीआई के जरिए जांच से संबंधित फाइल नोटिंग और दस्तावेजों की मांग की ।किन्तु सीबीआई ने धारा 24 और गोपनीयता के सुरक्षा कवच का हवाला देते हुवे इस सूचना को देने से इनकार करते हुए आरटीआई अधिनियम की धारा 24 का सहारा लिया, जो जांच एजेंसियों को सुरक्षा और खुफिया मामलों में छूट प्रदान करती है । हालांकि, अधिनियम का परंतुक स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी सूचनाएं इस छूट के दायरे में नहीं आतीं ।जिसके बाद दिसंबर 2019 में चतुर्वेदी ने केंद्रीय सूचना आयोग में अपील दायर की। CIC ने संजीव चतुर्वेदी की अपील पर सुनवाई करते हुए सीबीआई के इस तर्क को खारिज कर दिया कि उसे सूचना देने से पूरी तरह छूट प्राप्त है। आयोग ने आदेश दिया कि सीबीआई को उन भ्रष्टाचार मामलों की फाइल नोटिंग्स और दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां देनी चाहिए जिन्हें चतुर्वेदी ने सीवीओ के रूप में जांच के लिए भेजा था । आयोग ने यह माना कि भ्रष्टाचार के आरोपों के मामले में जांच एजेंसियां आरटीआई के दायरे से बाहर नहीं रह सकतीं ।सीबीआई ने सीआईसी के आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। यह याचिका वर्ष 2020 में दायर की गई थी और इसकी सुनवाई न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की एकल पीठ के समक्ष हुई ।
250 पृष्ठों की असाधारण दलील
न्यायिक परंपरा के अनुसार, लिखित दलीलें (Written Submissions) संक्षिप्त और सारगर्भित होती हैं, जिनका उद्देश्य न्यायालय का समय बचाना और मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करना होता है। कानूनी विश्लेषकों का कहना था कि सामान्यतः उच्च न्यायालयों में लिखित दलीलें 3 से 5 पन्नों तक सीमित रहती हैं, ऐसे में 250 पृष्ठों का विस्तृत सबमिशन स्थापित न्यायिक परंपराओं से इतर था। इसे एजेंसी की उस रणनीति के रूप में देखा जिसमें मामले को इतना जटिल और विस्तृत बना दिया जाए कि निर्णय में देरी हो या व्हिसलब्लोअर को हतोत्साहित किया जा सके, अदालत ने 22 नवंबर 2023 को इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
एकल पीठ का ऐतिहासिक निर्णय (30 जनवरी 2024)
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने निर्णय में सीबीआई के “पूर्ण छूट” के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मामलों में धारा 24 का परंतुक प्रभावी होता है और एजेंसी को सूचना देनी ही होगी 。 निर्णय के प्रमुख विश्लेषण बिंदु निम्नलिखित हैं:1. सूचना की प्रकृति बनाम संगठन की प्रकृति: न्यायालय ने माना कि भले ही सीबीआई एक छूट प्राप्त संगठन है, लेकिन मांगी गई “सूचना” की प्रकृति (भ्रष्टाचार का आरोप) अधिक महत्वपूर्ण है ।2. संवेदनशीलता का तर्क: सीबीआई ने दलील दी कि सूचना साझा करने से उनके अधिकारियों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि अस्पताल की खरीद से जुड़ी फाइलों को संवेदनशील जांच नहीं माना जा सकता ।सार्वजनिक हित: भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में पारदर्शिता एक अनिवार्य घटक है, और आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य ऐसी जानकारी को जनता तक पहुँचाना है ।
अवमानना याचिका और “आर्म-ट्विस्टिंग” के संगीन आरोप
उच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद, सीबीआई ने संजीव चतुर्वेदी को सूचना उपलब्ध नहीं कराई। इसके बजाय, एजेंसी ने इस आदेश को खंडपीठ (Division Bench) में चुनौती देने की प्रक्रिया शुरू की । जब निर्धारित समय सीमा के भीतर सूचना नहीं दी गई, तो चतुर्वेदी ने मार्च 2024 में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दायर की, जिस पर न्यायालय ने सीबीआई को नोटिस जारी किया ।सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर चतुर्वेदी पर ‘आर्म-ट्विस्टिंग’ यानी दबाव बनाने का सीधा आरोप लगाया गया । दिलचस्प तथ्य यह है कि सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी सर्वोच्च न्यायालय में चतुर्वेदी की आरटीआई याचिकाओं को ‘प्रेशर टैक्टिक्स’ करार दिया था । यह पैटर्न दर्शाता है कि कैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध पारदर्शिता की मांग करने वाले अधिकारियों को ही व्यवस्था के विरुद्ध शत्रु के रूप में पेश किया जा रहा है। खंडपीठ और 306 पृष्ठों का “रिकॉर्डतोड़” सबमिशन एकल पीठ के आदेश के विरुद्ध सीबीआई की अपील जब खंडपीठ के पास पहुंची, तो वहां भी दलीलों की लंबाई एक नया मुद्दा बन गई। दिसंबर के प्रथम सप्ताह में, सीबीआई ने 306 पन्नों की लिखित दलील दाखिल की यह न केवल उनके स्वयं के 250 पन्नों के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि एजेंसी इस मामले को एक “लीगल वॉर ऑफ एट्रिशन” (Legal War of Attrition) में बदलना चाहती है, इतनी विस्तृत दलीलों की आवश्यकता तब उत्पन्न होती है जब मामले के मूल गुण-दोष (Merits) कमजोर हों और कानूनी बारीकियों के जाल में निर्णय को उलझाना हो। सीबीआई का मुख्य संघर्ष यह है कि यदि संजीव चतुर्वेदी यह सूचना प्राप्त कर लेते हैं, तो यह भविष्य के लिए एक मिसाल बन जाएगा, जिससे आरटीआई की धारा 24 के तहत सीबीआई को मिलने वाली “अघोषित सुरक्षा” हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है.
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