उत्तराखंड हाईकोर्ट की सख्ती: मसूरी वन क्षेत्र में सीमा चिन्हों की गुमशुदगी पर जांच के आदेश – पर्वतजन

नैनीताल: हिमालय की नाजुक पर्यावरणीय व्यवस्था की रक्षा से संबंधित एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कड़ा कदम उठाया है। मसूरी के वन क्षेत्र में कथित रूप से हो रहे गैरकानूनी कब्जे के मामले में अदालत ने चिंता जताई है। यहां मसूरी वन डिवीजन से 7,000 से ज्यादा वन सीमा चिन्हों के रहस्यपूर्ण तरीके से लापता होने की घटना पर उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) तथा उत्तराखंड राज्य सरकार और उसके वन विभाग को नोटिस भेजे हैं।यह निर्देश न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी के नेतृत्व वाली पीठ ने एक लोक हित याचिका की सुनवाई के दौरान जारी किया। याचिका दाखिल करने वाले पक्ष की ओर से वकील गौरव कुमार बंसल ने अदालत को सूचित किया कि वन क्षेत्रों की हदबंदी के लिए स्थापित किए गए ये चिन्ह सोची-समझी योजना के तहत हटाए गए हैं। इससे मसूरी जैसे संवेदनशील हिमालयी इलाके में व्यापक कब्जा, अनधिकृत निर्माण कार्य और पर्यावरणीय क्षति का मार्ग प्रशस्त हो गया है।याचिका में आरोप लगाया गया कि यह घटना केवल असावधानी का परिणाम नहीं है, बल्कि भ्रष्ट वन अधिकारियों, राजनीतिक हस्तियों और भूमि गिरोहों की संदिग्ध सांठगांठ से जुड़ी है। वकील बंसल ने वन विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड का जिक्र करते हुए कहा कि कुल 7,375 सीमा चिन्हों के गायब होने की पुष्टि हुई है, जिनमें से ज्यादातर मसूरी और रायपुर रेंज जैसे आर्थिक महत्व वाले क्षेत्रों से संबंधित हैं।याचिका के मुताबिक, वन सीमाओं का उन्मूलन होने से न सिर्फ जंगलों का बड़े स्तर पर ह्रास हुआ है, बल्कि भूमि धंसाव की आशंका भी बढ़ गई है। परिणामस्वरूप, हालिया महीनों में इस क्षेत्र में बाढ़, सड़कों का क्षतिग्रस्त होना और यातायात संपर्कों में बाधा जैसी दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं।अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि वन विभाग की कार्य योजना इकाई ने उच्च स्तर की जांच की अनुशंसा की थी, लेकिन राज्य प्रशासन ने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। इसके विपरीत, एक अधिकारी के माध्यम से सतही समीक्षा का प्रयास किया गया, जिसे याचिकाकर्ता ने प्रभावशाली व्यक्तियों की रक्षा करने की रणनीति करार दिया।मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने सीबीआई से संभावित अपराधिक षड्यंत्र और अवैध संपदा संचय की जांच के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है। साथ ही, एमओईएफसीसी से वन संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अपनी जिम्मेदारी निर्धारित करने को कहा गया है। पीठ ने कहा कि मसूरी में वन सीमा चिन्हों का लुप्त होना एक अत्यंत चिंताजनक मुद्दा है, जिस पर केंद्रीय और राज्य स्तर पर स्पष्टीकरण आवश्यक है।याचिका में वन क्षेत्रों की दोबारा हदबंदी और डिजिटल मैपिंग, वन भूमि का राजस्व विभाग से वन विभाग को हस्तांतरण तथा एक व्यापक पर्यावरणीय बहाली कार्यक्रम विकसित करने की भी अपील की गई है।

Sapna Rani

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