देहरादून, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की मेधावी छात्राओं को आगे बढ़ाने के लिए देहरादून जिला प्रशासन ने एक और मिसाल पेश की है। चन्द्रबनी क्षेत्र की रहने वाली प्रियंका कुकरेती, जिनके पिता का देहांत 2021 में हो गया था और परिवार की आर्थिक स्थिति लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रही, अब एक निजी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में लैब ऑफिसर के रूप में कार्यरत होंगी। यह नियुक्ति जिला प्रशासन की विशेष पहल के तहत सुनिश्चित की गई है।
मां के साथ पहुंचकर जताया आभार, डीएम ने पूछा, क्या आगे पढ़ना चाहेंगी?
नौकरी मिलने के बाद प्रियंका अपनी मां के साथ जिलाधिकारी सविन बंसल से मिलीं और प्रशासनिक सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। बातचीत के दौरान डीएम ने उनकी आगे की पढ़ाई को लेकर इच्छाशक्ति के बारे में पूछा। प्रियंका द्वारा उच्च शिक्षा जारी रखने की इच्छा जताने पर जिलाधिकारी ने तुरंत एमटेक में प्रवेश की प्रक्रिया शुरू करने के आदेश दे दिए।
एमटेक की फीस, अध्ययन सामग्री और अन्य शैक्षणिक व्यय का भार जिला प्रशासन और संबंधित निजी संस्थान संयुक्त रूप से वहन करेंगे।
राइफल फंड से सहारा, फिर मिला स्थायी रोजगार
कुछ महीने पहले प्रियंका ने प्रशासन को बताया था कि—
, पिता का निधन होने के बाद घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है! भाई दिव्यांग है और परिवार जीविकोपार्जन में कठिनाई झेल रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने राइफल फंड से 25,000 रुपये की आर्थिक मदद प्रदान की थी। आगे उनकी योग्यता का मूल्यांकन करने के बाद रोजगार दिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई।
बालिकाओं की शिक्षा पुनर्जीवित करने की बड़ी मुहिम जारी
जिला प्रशासन ने बताया कि अब तक 32 लाख रुपये की सहायता से 90 बालिकाओं की पढ़ाई फिर से शुरू कराई गई है। मुख्यमंत्री द्वारा लिये गए “शिक्षित बेटियां, सशक्त समाज” के संकल्प को आगे बढ़ाते हुए नंदा–सुनंदा योजना के माध्यम से उन परिवारों को प्राथमिकता दी जा रही है जिनकी बेटियों की पढ़ाई आर्थिक कारणों से रुक जाती है।
अगले सत्र में एमटेक में दाखिला सुनिश्चित
जिलाधिकारी सविन बंसल ने कहा कि प्रियंका का एमटेक (कंप्यूटर साइंस) में दाखिला आगामी सत्र में उसी संस्थान में कराया जाएगा ताकि उनका करियर बिना रुके आगे बढ़ सके।
उनके शब्दों में,
“किसी भी बेटी की पढ़ाई आर्थिक तंगी के कारण रुकने नहीं दी जाएगी। प्रशासन पूरी तरह सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।”
यह पहल न सिर्फ प्रियंका के भविष्य को सुरक्षित बनाती है, बल्कि उन अनेक परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है जो आर्थिक कारणों से अपनी बेटियों की शिक्षा जारी नहीं रख पा रहे हैं।
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