उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सुरक्षा मांगने गए एक कपल की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें खूब फटकार लगाई। कोर्ट ने पूछा कि क्या बालिग होने का मतलब यह है कि बच्चों के जीवन में माता-पिता की कोई राय नहीं बची है? दरअसल 18 साल की लड़की ने 21 साल के लड़के से घर से भाग कर मंदिर में शादी कर ली थी। जिसके बाद उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखाटाया। उन्होंने कोर्ट में बताया कि उनके परिवारवाले उनकी शादी स्वीकार नहीं कर रहे और अब उन्हें धमकियां भी मिल रही हैं। हालांकि कोर्ट ने याचिका पर सुनावई करते हुए कहा कि क्या बच्चों के बालिग होने के बाद माता-पिता उनकी शादी को लेकर कुछ नहीं कह सकते?
पहले लगाया 10 लाख का जुर्मानाबार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक सुनवाई के दौरान जस्टिस थपलियाल ने कहा, यह किस तरह की शादी है? सिर्फ इसलिए कि वे बालिग हैं, वे कुछ भी करेंगे? जिन माता-पिता ने उन्हें जन्म दिया, क्या उनकी कोई बात नहीं मानी जाएगी? अदालत ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि बच्चे पाल-पोसकर बड़ा करने वाले माता-पिता से सलाह तक नहीं लेते और फिर सीधे अदालत आकर उन्हीं पर धमकी देने का आरोप लगा देते हैं। जज ने आगे कहा, समाज कहां जा रहा है? मां-बाप ने तुम्हें जन्म दिया, इतनी मुश्किलों से पाला और अब वे तुम्हारे दुश्मन हो गए? ऐसे लोगों के लिए यहा कोई जगह नहीं है जो अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते। एक समय पर तो कोर्ट इतना नाराज हुआ कि याचिका को 10 लाख रुपये के जुर्माने के साथ खारिज करने तक की बात कह दी।
कोर्ट ने कहा, पहले अपने माता-पिता से पूछो। उन्होंने तुम्हें जन्म दिया और इतनी कठिनाइयों के साथ पाला-पोसा, और अब वे तुम्हारे दुश्मन हैं? तुम्हें खतरा महसूस होता है और तुम चाहते हो कि हम पुलिस को तुम्हारे माता-पिता को गिरफ्तार करने का निर्देश दें क्योंकि तुम्हें शादी करनी है? 10 लाख रुपये के जुर्माने के साथ मामला खारिज! यहां क्यों आए हो? अपने माता-पिता के पास जाओ? जो अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते, उनके लिए यहां कोई जगह नहीं है। अपनी सुरक्षा का इंतजाम खुद करो, क्योंकि कानून ऐसे लोगों का साथ नहीं दे सकता।
बेटी की मां से बात करना चाहते थे जजअदालत ने सुनवाई के दौरान लड़की से उसकी मां का फोन नंबर भी मांगा। न्यायमूर्ति ने कहा, हम तुम्हारी मां से बात करेंगे और उन्हें कम से कम यह बताएंगे कि उनकी बेटी यहाँ है। कल को अगर वह हमसे पूछेंगी कि हमने इस शादी की अनुमति कैसे दे दी, तो हम क्या जवाब देंगे? हालांकि, बाद में कोर्ट ने माता-पिता से बात नहीं की। हालांकि शुरुआती नाराजगी के बावजूद, कानून के दायरे को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने माना कि राज्य की एजेंसी होने के नाते पुलिस का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह नागरिकों की जान-माल की रक्षा करे।
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