देहरादून। चातुर्मास की पावन एवं स्वर्णिम बेला में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद से परम पूज्या आध्यात्मिक श्रमणी आर्यिका रत्न श्री 105 पूर्णमति माताजी के ससंघ सानिध्य में गांधी रोड स्थित जैन धर्मशाला में धर्म, साधना और आध्यात्मिक चेतना की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन विविध धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जा रहा है।
धर्मसभा में नित्य पूजन-पाठ, मंगल प्रवचन, माताजी की साधनापूर्ण दिनचर्या, आहारचर्या, तीन बार सामायिक, श्रद्धालुओं से आध्यात्मिक संवाद, महिलाओं की धार्मिक कक्षाएं और बच्चों की पाठशाला का आयोजन हो रहा है। सायंकाल गुरु भक्ति के पश्चात भव्य महाआरती से वातावरण भक्तिरस में सराबोर हो उठता है।
संयोगों में सुख नहीं, आत्मा की पहचान में है सच्चा आनंद
धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्या आर्यिका श्री 105 पूर्णमति माताजी ने णमोकार महामंत्र के शुद्ध उच्चारण से धर्मसभा का शुभारंभ कराया। उन्होंने णमोकार महामंत्र के जाप की विभिन्न विधियों का वर्णन करते हुए बताया कि श्रद्धा, शुद्धता और एकाग्रता के साथ मंत्र का स्मरण आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
माताजी ने मंदिर में प्रवेश की विधि एवं उसके आध्यात्मिक महत्व को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि खिले हुए फूल को मुरझाने से रोकना किसी के वश में नहीं है। उदित हुए सूर्य को अस्ताचल में जाने से रोकने में भी कोई समर्थ नहीं है, लेकिन कर्मों के उदय पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जिन्होंने कर्मों पर विजय प्राप्त की, वे आज सिद्धालय में विराजमान हैं। इसलिए जीवन का लक्ष्य एक ही होना चाहिए—कर्मों के उदय पर विजय प्राप्त करना और इसके लिए निरंतर पुरुषार्थ करना।
उन्होंने कहा कि मनुष्य भौतिक भोगों और सांसारिक संयोगों के पीछे भागते हुए अपने वास्तविक स्वरूप को भूलता जा रहा है। भोगों को पाने की चिंता ही मनुष्य के दुख का कारण बनती जा रही है। संसार में दुःख व्याप्त है, फिर भी मनुष्य उसी के पीछे निरंतर दौड़ रहा है।
माताजी ने प्रेरक भाव में कहा, “अरे! तुझे संयोगों में मजा लगता है। ये मजा नहीं, सजा है।” उन्होंने आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि मनुष्य को पहले यह जानना चाहिए कि उसका वास्तविक घर कौन सा है और वह कहां जाना चाहता है।
उन्होंने कहा कि आंखें बंद करके जड़ घर का चिंतन करें तो घर की एक-एक वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है और उसकी पहचान हो जाती है, लेकिन जिस चेतन आत्मा का वास्तविक घर है, उसका चिंतन हम कभी नहीं करते। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य बाहरी संसार से दृष्टि हटाकर अपने भीतर स्थित चेतन स्वरूप को पहचानने का पुरुषार्थ करे।
नेमिकुमार, श्रीकृष्ण व बलभद्र की बिनौली यात्रा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
चातुर्मास के धार्मिक आयोजनों की इसी कड़ी में नेमिकुमार, श्रीकृष्ण एवं बलभद्र बिनौली यात्रा (स्वागत समारोह) का आयोजन किया गया। 1008 श्री पार्श्वनाथ पद्मावती तीर्थ धाम सोसाइटी, क्लेमेंट टाउन में शाम पांच बजे से प्रारंभ हुई बिनौली यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। शाम 6:30 बजे यात्रा साक्षी इलेक्ट्रिकल से सेंट मैरी स्कूल होते हुए नासिक ढोल पार्टी के संगीतमय भजनों और भक्तिमय वातावरण के बीच मंदिर परिसर पहुंची।
यात्रा के दौरान मार्ग में पड़ने वाले प्रतिष्ठानों एवं आवासीय क्षेत्रों में श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने भव्य स्वागत किया। जगह-जगह पुष्पवर्षा एवं मंगल अभिनंदन से वातावरण धर्ममय हो उठा।
मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि चातुर्मास के धार्मिक आयोजनों के क्रम में कल दोपहर तीन बजे गांधी रोड स्थित जैन धर्मशाला में हल्दी समारोह आयोजित किया जाएगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ लेने का आह्वान किया।
धर्मसभा एवं धार्मिक आयोजनों में जैन समाज के साथ ही अन्य समाजों के गणमान्य नागरिकों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। चातुर्मास के इन आयोजनों से क्षेत्र का वातावरण भक्ति, संयम, साधना और आत्मचिंतन की दिव्य भावना से ओतप्रोत है।
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